रामचरित मानस का यह रावण मारीच प्रसंग बहुत प्रेरणा दायक है !स्वारथी लोगों के आदर देने के तरीके युगानुसार बदलते रहते हैं !किन्तु व्यक्तियोँ से अपनी स्वार्थ पूर्ति करा लेने का भाव नहीं बदलता है !आज भी इसी प्रकार के स्वार्थी व्यक्ति अन्य अनेकों प्रकार से अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अभिवादन नमस्कार प्रसंसा आदि के अनेकों प्रकार के तरीके इस्तेमाल करते हैं !इस प्रकार के स्वार्थी लोगों को आधुनिक काल में चमचा या चापलूस कहा जाता है !और ये लोग येन केन प्रकारेण अपना स्वार्थ सिद्ध कराने में सफल भी हो जाते हैं !इतिहास में ऐसे अनेकों प्रसंग है ! जिनके कारण इन छुद्र स्वार्थों की पूर्ति में लगे हुए लोगों ने राष्ट्र को बहुत छति पहुंचाई है !महाभारत में व्यासदेव ने कहाः है कि जो लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए राष्ट्र को छति पहुंचाते हैं बे मुर्दे में उत्पान्न हुए कीड़ों की तरह स्वयं नष्ट हो जाते हैं !मारीच ने भी रावण के इस अत्यंत स्वार्थ निष्ठ मनोरथ को बुद्धिमत्ता से स्वीकार कर लिया था !वह जानता था की रावण का यह आदर मात्र उस से अपना स्वार्थ सिद्ध कराने का था !और स्वार्थ सिद्ध न होने पर वह मारीच का वध भी कर सकता था !उसकी बात मानकर स्वर्ण मृग के रूप में छल करने से भी भगवान श्री राम के हाथोँ उसकी मृत्यु भी निश्चित थी !इसीलिए उसने विवेक पूर्ण निर्णय लिया कि मृत्यु भगवान के हाथोँ होगी तो उसे परमधाम की प्राप्ति होगी !और यदि रावण के हाथोँ से मारा जाएगा तो नरक वास होगा !इसीलिए उसने रावण की स्वार्थ दृष्टि में भी अपनी मुक्ति का मार्ग खोज लिया था !
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