Sunday, 6 September 2015

गांधी जी केस्वप्नो का भारत था !भारत के स्वाबलंबी गाओं !भारत में बिभाजन के बाद ५५० लाख गाओं रह गए थे !प्राचीन भारत में विशेष तौर महाभारत में स्वर्णिम स्वाबलंबी गाओं का दर्शन प्रचुरता  से होता है !गाओं फलदार ब्रक्छोँ और दुधारू पशुओं और निर्मल जल से भरे हुए सरोवरों के केंद्र होते हैं !उस काल के भारत के गाओं का स्वाबलंबी स्वरुप चित्त को चुराकर स्वप्न लोक में पहुंचा देता है !किन्तु आज के भारत की गाओं की दुर्दशा देख कर किसी का भी ह्रदय जिसने प्राचीन भारत के गाओं के बारे में पढ़ा होगा दर्द से कराह उठेगा ! गांधी जी कहते थे ! भारत का प्रत्येक गाओं एक गड़तन्त्र होगा !और वह अपनी जरुरत की आवश्यकताओं के लिए किसी पर आश्रित नहीं होगा !भयानक बेरोजगारी के इस समय में और कागजी नोटों के आकरषण से ऊपर उठकर अब बहुत से शिक्छित प्रसिक्छित युवा अब कृषि कार्य में दिलचस्पी लेकर धनोपार्जन के नए छेत्र विकसित कर रहे हैं !युवाओं का अब शहरी जीवन से मोह भंग हो रहा है !कुरुक्छेत्र के इस छोटे से गाओं का अप्रत्यासित विकास देख कर देश के अन्य युवा भी प्रोत्साहित होंगे  !और कृषि में नयी लाभकारी उपजों को उपजा कर कृषि कार्य को अधिक उपयोगी और युवाओं तथा कृषकों को कृषि की और आकर्षित करेंगे !गाओं के विकास से ही शहरों का विकास होगा !गाओं से शहरों की और पलायन रुकेगा !और देश भी पिरामिड की तरह धन धान्य से उसी प्रकार परिपूर्ण होगा जैसा प्राचीन भारत था !गुलाम भारत नहीं !गुलामी के पहले का भारत !

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