वैदिक संस्कृति में जीवों को अभयदान देना श्रेष्ठ दान माना गया है !जो लोग भारत में मशाहार का समर्थन करते है !बे भारत की आत्मा का आत्मघात करते हैं !विश्व की अनेक माशाहारी कौमें माशाहार का त्याग कर शाकाहार को अपना रहीहै !मुसलिम राष्ट्र पाकिस्तान में भी सप्ताह में एक दिन अमिश भोजन का निषेध किया गया है !भारत में ऐसे अनेक राज ऋषि हुए है ! जिन्होंने माष भक्छण और जीव हत्या को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित किया था ! महाभारत में माष भक्छण में अनेक दोष बताये गए हैं !!भीष्मपितामह युधिस्ठर से कहते है ! जो दूसरे के मांश से अपना मांश बढ़ाना चाहता है !उस से बढ़कर नीच और निर्दयी मनुष्य दूसरा कोई j मनुष्य नहीं है ! जगत में अपने प्राणो से अधिक प्रिय कोई दूसरी बस्तु नहीं है इसीलिए मनुष्य जैसे अपने ऊपर दया चाहता है ! उसी तरह जीवों पर भी दया करे ! इस लोक और परलोक में जीवों की रक्षा करने के समान दूसरा कोई पुण्य कार्य नहीं है ! प्राण दान से बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है ! और ना होगा ! अपने आत्मा से बढ़कर प्रियतर बस्तु दूसरी कोई नहीं है ! जो जीवित रहने की इक्छा रखे वाले प्राणियों के मांस को खाते हैं ! बे दूसरे जन्म में उन्ही प्राणियों द्वारा खाए जाते हैं ! इस विषय में मुझे संशय नहीं है !जिसका बध किया जाता है ! वह कहता है !भले ही माष के लिए ह्त्या करने वाले को उसकी अव्वाज समझ में न आये कि आज मुझे वह खाता है ! तो मै भी कभी उसे खाऊंगा ! अहिंसा परम धर्म है ! अहिंसा परम संयम है ! अहिंसा परम दान है ! और अहिंसा परम तपस्या है ! अहिंसा परम यज्ञ है ! अहिंसा परम फल है ! अहिंसा परम मित्र है ! और अहिंसा परम सुख है !!जैन धर्म के इस पावन पवन ब्रत में सहयोग कर पुण्य प्राप्त करें ! और जीवमात्र को कम से कम हमेशा के लिए नहीं तो,कुछ काल अभय दान देकर !समस्त निरीह और मूक बेज़ुबान जीवों पर जो मनुष्योँ की दया और कृपा पर आश्रित हैं ! इन जीवों को जीवन दान प्रदान कर जीवों का आशीर्वाद प्राप्त कर जैन समाज द्वारा प्रदत्त इस अवसर से पुण्य लाभ प्राप्त करें !विरोध कर अक्छय पाप के भागी बनकर श्रमण और वैदिक धर्म को कलंकित ना करें
No comments:
Post a Comment