राजतन्त्र के विकल्प के रूपमे भारी कुरबानियों के बाद विश्व के मुसलिम देशों को छोड़कर लोकतंत्र आया !और इस लोकतंत्र का स्वरुप भी साम्यबाद और समाज बाद के रूप में प्रस्तुत हुआ !लोकतंत्र के इन स्वरूपों ने पूंजीबाद पर हमला किया !और प्राकृतिक संसाधनो को व्यक्तिगत मालिकी से छीनकर साम्यबाद ने शाशन को सुपुर्द करने का दर्शन प्रस्तुत किया !और समाजवाद ने समाज के सुपुर्द करने की बात रखी !किन्तु पहले मनुष्य राजा के रूप में सामंत वादी स्वरुप से प्राकृतिक संसाधनो पर काबिज था !लोकतंत्र में मनुष्य साम्यवाद और समाजवाद का चोला ओढ़कर टोली बनाकर प्राकृतिक संसाधनो पर काबिज हो गया !जनता को उसका बाजिब हक़ आज भी प्राप्त नहीं हुआ है !और आज भी संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से प्रधान मंत्री गरीबी उन्मूलन की बात कर रहे हैं !और गरीबी उन्मूलन के रूप में प्राकृतिक संसाधनो को उद्योग पतियों के अधिकार से मुक्त करने के बजाय गरीबों के स्किल बिकास की बात कर रहे हैं !यह तो ऐसा हीहै !जैसे कोई आग बुझाने का प्रयत्न आग लगाकर करे !हर बर्ष सालों से संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से विश्व की सरकारों के प्रधान मंत्री गरीबी उन्मूलन की बात करते हैं !किन्तु गरीबी घटने के बजाय बढ़ जाती है !जब तक सत्ता में पहुंचे लोगों के ह्रदय में स्वार्थ बृत्ति का अधिपत्य रहेगा ! तब तक वह राजा के रूप में हो या लोकतंत्र में साम्यबदी या समाजवादी के रूप में हो उसके द्वारा आम जनता का शोषण होतरहेगा !और गरीबी कभी भी समाप्त नहीं होगी !इसीलिए व्यबस्था परिवर्तन के स्थान पर व्यक्ति के स्वार्थनिष्ठ आचरण में परिवर्तन को प्राथमिकता देनी होगी !क्योँकि व्यबस्था कोई भी हो उसका संचालक और व्यबस्थापक तो मनुष्य ही होगा !अगर मनुष्य नहीं बदलेगा !तो व्यबस्था बदलते रहने का कोई अर्थ नहीं होगा ! इसीलिए गांधीजी व्यबस्था परिवर्तन के साथ चित्त शुद्धि परविशेष जोर देते थे ! मनुष्य को शुद्ध पवित्र प्रेम करुणा और परमार्थ और आत्मदृष्टि से सभी प्राणियोँ में एक ही आत्मा को जानकर और मानकर सभी के दुःख निवारण के लिए मन बुद्धि चित्त को सुधार करने की साधना न तो समाजवाद में हैं और न साम्यवाद और पूंजीवाद में है !यह साधना भारत बर्ष में गीता ग्रन्थ में है !जो अनासक्ति का उपदेश करके प्रत्येक व्यक्ति को राग द्वेष से मुक्त होकर कर्तव्य कर्म करने की शिक्छा देती है !और मन बुद्धि को रागद्वेष से मुक्त करने के उपाय भी बताती है !
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