महाभारत में सत्य धर्म लज्जा और सरलता के अनेक बदले हुए युग केअनुसार कथानक उदाहरण सहित प्रस्तुत किये हैं ऋषियोँ ने काल को सतयुग त्रेता द्वापर और कलियुग ४ भागों में बिभक्त किया है !और काल क्रम से ही सत्य धर्म सरलता और लज्जा के क्रियांबन का स्वरुप भी प्रस्तुत किया है !धर्म के चार पैर होते हैं !सतयुग में धर्म के चारों पैर होते है और क्रमशः युग के अनुसार पैरों की संख्या घटती चली जाती है !कलियुग जो वर्तमान समय में है उसकी आयु शाश्त्रों में ४लाख ३२ हजार बर्ष बतायी गयी है !अभी कलियुग का कुल ५३०० वृष ही लगभग समाप्त हुए है !महाभारत का युद्ध द्वापर और कलियुग की संधि बेला में हुआ था !भगवान श्री कृष्णा के बैकुंठ धाम में जाते ही कलियुग आ गया था ! इसिलिये धर्म की मूल भावना और तत्त्व की रक्छा के लिए नीति का निर्माण करना पड़ता है !गीता में कहा है !नीतिरश्मि जिगिस्ताम १०(३८)विजय की कामना करनेवालों की नीति में ही हूँ !जिस समय द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था !उस समय वह कौरब सभा में मौजूद सभी धर्मज्ञ सभासदों से द्रौपदी चिल्ला चिल्ला के कह रही थी ! कि क्या में हारी गयी हूँ ?तब भीष्म ने कहा था धर्म की गति अत्यंत सूक्छम है !इसीलिए काल और परिश्थिति के अनुसार कभी कभी धर्म अधर्म होजाता है !और अधर्म धर्म हो जाता है !इसके कई कथानक महाभारत में है !इसीप्रकार सत्य भी काल और परिश्थिति के अनुसार असत्य सत्य और सत्य असत्य हो जाता है !द्रोणाचार्य की मृत्यु के लिए धर्म राज युधिस्ठर को झूठ बोलना पड़ा था !क्यूोंकि दिव्य शक्तियोँ से युक्त द्रोणा चार्य को युद्ध में परास्त नहीं किया जा सकता था !इसी प्रकार लज्जा का त्याग भी भोजन इत्यादि में करना पड़ता है !दुस्ट समूहों से निर्लज्जता पूर्वक ही ब्योहार करना पड़ता है !आचरण भ्रष्ट दम्भी पाखंडी कपटी लोग भी सरलता को पाखण्ड ही समझते हैं !इसीलिए गीता में १८(७८)कहा है कि जहां योगेश्वर श्री कृष्णा है और जहां गांडीव धनुषधारी अर्जुन हैं वहां ही श्री ,विजय विभूति और अचल नीति है ऐसा मेरा मत है !अर्थात जहां शक्ति है धर्म है और नीति है और युक्ति हैं !वहीं धर्म सत्य लज्जा ओरसरलता का पालन संभव है भीष्म पर्व में कहा गया है यतः कृष्णः ततो जयः ततो धर्मः
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