भारत भूमि धार्मिक आस्था का केंद्र अनादिकाल से रही है !इस भूमि की धर्मकी गंगा को सन्यासियों साधुओं संतो और राजऋषियों ने तपस्या त्याग से सींचा है! यहाँ की राजा प्रजा सभी चौथे पन यानी ७५ साल की आयु होने पर राज और गृह को त्याग कर तपस्या के द्वारा शरीर त्यागने और मोक्ष की प्राप्ति के लिए जंगल में तपस्वी जीवन जीते हुए निवास करते थे !किन्तु समय के उलट फेर के कारण राजा प्रजा सभी का जीवन भोग प्रधान हो गया ! और यह परम्परा लग भाग लुप्त हो गयी !किन्तु धर्म में श्रद्धा विस्वाश और आस्था आज भी विद्यमान है !उसी आस्था का परिणाम है कि आज भी मंदिरों के पास अकूत संपत्ति है !जो मंदिरों के व्यबस्थापक , पुजारी मंदिरों में दिए गए दान का अपने लिए प्रयोग करते हैं !बे इसके गंभीर परिणाम भोगते है !शस्त्रों मेबताया गया है ! की ऐसे धर्म का चोला ओढ़कर अधर्म करने वालों को घोर नर्कबास की प्राप्ति होती है !और इनका अगला जन्म कुत्ते सूअर आदि की योनि में होता है !मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था विश्वाश के केंद्र है !इसिलए मंदिरों को दान में प्राप्त धनराशि को मंदिरों के पास ही रहने देना चाहिए !भले ही आय व्यय की निगरानी सरकार करती रहे !धर्म के मामले में सरकारी हस्तछेप से जो अधर्म पाखण्ड इत्यादि धर्म का चोला ओढ़कर पंडों पुजारियों व्यबस्थापको द्वारा छिपे रूप में किया जा रहा है ! वह सरकारी नियंत्रण में रिश्वतखोरी ,कर्त्तव्य भ्रष्टता आदि के कारण खुले आम किया जाने लगेगा !अभी देश के जो मंदिर सरकारी नियंत्रण में है !उनकी हालत इन मंदिरों से भी बुरी है !अभी पुजारी कम से कम विधिविधान से पूजा अर्चा तो करते हैं !सरकारी नियंत्रण में मंदिरों के जाने से दान तो रिश्वतखोर अधिकारिओयों की जेब में चला जाएगा ! और मंदिरों की विधि बिधान से होने वाली परंपरागत पूजा अर्चा भी समाप्त हो जायेगी !
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