Thursday, 20 August 2015

स्नान का बहुत महत्त्व वैदिक धर्मग्रन्थोँ में बताया गया है !प्राचीन भारत में त्रिकाल संध्या और विधिपूर्वक तीन बार लोग स्नान करते थे !इसलिए स्नान ध्यान यह उक्ति समाज में प्रचिलित थी !समय परिवर्तन शील होता है !इसलिए समय के साथ सुचिता के नियम तो बदल जाते हैं किन्तु सुचिता का मूल तत्त्व विद्यमान रहता है !इस युग में पवित्र नदियों का जल प्रदूषित होगया है !शहरोँ में शुद्ध जल का अभाव हो गया है !भौतिकता ने मनुष्योँ का सुख चैन शांति और शरीरगत शुचिता का अपहरण कर लिया है !असत्य  अनैतिकता अशुद्ध आचरण आदि इस समय अधिकाँश लोगों में दिखाई देते हैं !इसलिए आचार्यों ने अंगशुचिता के साथ अब बाणी सुचिता को भी स्नान के साथ जोड़ दिया है !और स्थूल तीर्थ स्थलों में स्नान के साथ मानसिक सुचिता को भी जोड़ दिया है !महाभारत में धर्म व्याध और कौशिक ब्राह्मण सम्बाद में धर्मव्याध कहता है !की तीर्थ स्थानो में भटकने के बजाय मानसिक सुचिता को ही जीवन का ध्येय बनाओ !पवित्रतता जीवन का अंग बन जाए और सदाचरण में हमारी रूचि स्वाभाविक और सहज बन जाए !उसके लिए नित्य प्रिति पवित्र ब्यक्तियों और पवित्र वस्तुओं का स्मरण आवश्यक है !इसीलिए सनातन धर्मावलम्बी अपनी संतानो का नाम राम कृष्णा गणेश शंकर सरस्वती लक्ष्मी आदि रखते हैं ! जीवात्मा पवित्र लोगों का संग करके पवित्र बनती है ! और दुष्ट लोगों का संग करके दुष्ट बन जाती है !इसलिए धर्मग्रंथों में श्रेष्ठ सदाचारी पुरुषों की संगत का विशेष महत्त्व बतलाया गया है !एक श्लोक में कहा गया है !की सत्संग  बुद्धि की जड़ता को समाप्त करता है !बाणी में सत्य का प्रवेश करा देता है !व्यक्ति की ख्याति बढ़ जाती है !उसको मान सम्मान की प्राप्ति सभी ओर से होती है !भला सत्संग से मनुष्य को कौन सा लाभ प्राप्त नहीं होता है ?अर्थात मनुष्य को सबकुछ सत्संग से प्राप्तहो जाता है

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