Saturday, 15 August 2015

गीता का मुख्य उद्देश्य मोह से मुक्त कराना है !और इसके लिए गीता में भक्ति युक्त ज्ञान प्रधान कर्मयोग का निरूपण किया गया है !इस महान ग्रन्थ के अनुशीलन चिंतन मनन और स्वाध्याय से अलौकिक ग्यानी शंकराचार्य भक्ति के आचार्य रामानुजाचार्य आदि  और कर्मयोगी लोकमान्य तिलक आदि और अहिंसक महात्मा गांधी आदि अशख्यं महापुरुषों को प्रेरणा प्राप्त हुई !इस ग्रन्थ रत्न ने भारत की सीमा पारकर विश्व के अनेक महांभाव एडविन आर्नोल्ड एनी विसेंट  आदि  ऐसी महान आत्माओं का भी मार्गदर्शन किया है !और आज भी विश्व के महान लोग इस से मार्ग दर्शन प्राप्त कर रहे हैं !जितने भाष्य और टीकाएँ इस ग्रन्थ पर लिखी गयी हैं ! और आज भी लिखी जा रही हैं उतनी टीकाएँ और भाष्य  और किसी धर्म ग्रन्थ पर नहीं लिखी गयी हैं !इसलिए इस धर्मग्रन्थ पर विचार भिन्नता भी बहुत है !किन्तु यह ग्रन्थ का दोष नहीं है !इसकी विशेषता है !जो ग्रन्थ लाखों महापुरुषों और सामान्य मनुष्योँ की दृष्टि में महत्त्व प्राप्त करेगा !उसमे मत भिन्नता होना आश्चर्य की बात  नहीं है !कुछ लोग मानते है कि गीता को जो कुछ भी कहना था ! वह दूसरे अध्याय में कह दिया है !कुछ लोग मानते हैं !११(!)में अर्जुन ने यह कह दिया कि  उसका मोह नष्ट हो गया है !इसलिए गीता का उपदेश मोहनाश का यही समाप्त हो गया है !अर्जुन का मोह सिर्फ युद्ध में अपने परिजन गुरुजन के विरुद्ध युद्ध ना करने तक ही सीमित नहीं था !गीता महाभारत के सम्मिलित अध्यन से उसके मोह की कई शाखाओं का ज्ञान होता है !जिसका निरसन भगवान लगातार करते दिखाई देते हैं !जब भगवान ने ४(१)में कहा की मेने इस कर्म योग का ज्ञान सर्व प्रर्थम सूर्य  को दिया था !तब  अर्जुन के मोह का निरसन अपने अवतार        के रहस्य    का उदघाटन   कर भगवान ने  किया !फिर   अर्जुन को अपनी  विभूतियां   दिखा  कर उसको  भगवान ने अपने विभूति  योग को बताकर  किया !इसलिए अर्जुन कहता है कि आपने जो हमें यह बताया है कि संपूर्ण विभूतियों के मूल में भगवान ही हैं ! और संपूर्ण बिभूतियां भगवान की सामर्थ्य से ही प्रगट होती हैं ! तथा अंत में भगवान में ही लीन हो जाती हैं ! वह अविचल भक्ति योग से युक्त  हो जाता है इसको अर्जुन अध्यात्म संगित मान रहे हैं ! संपूर्ण जगत भगवान के एक अंश में है ! इस तथ्य पर पहले अर्जुन की दृष्टि नहीं थी  और बे  स्वयं   इस बात को जानते भी नहीं थे  यही उनका  मोह था ! परन्तु जब भगवान ने कहा कि संपूर्ण जगत को अपने एक अंश में व्याप्त करके में तेरे सामने बैठा  हूँ  !तब अर्जुन की दृष्टि इस तरफ  गयी ! इसलिए अर्जुन यहां अपनी दृष्टि से कहते हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया है ! किन्तु भगवान इसे स्वीकार नहीं करते हैं ! क्योँकि आगे ११(४९)में भगवान ने कहा है ! कि तेरे को व्यथा और मूढ़ भाव (मोह )नहीं होना चाहिए !सारी गीता को ध्यान पूर्वक पढ़ने से यह बात समझ में आएगी कि अर्जुन के विविध प्रकार से मोह ग्रस्त चित को भगवान ने गीता के अंत तक  किया है !और अर्जुन अंत में फिर कहता है कि मेरा मोह नष्ट हो गया है !किन्तु महाभारत में वह कई प्रसंगो में मोह ग्रस्त होता है !जिसका निरसन सारथि कृष्ण करते हैं !और अंत में वह कहता है !कि में गीता के ज्ञान भूल गया हूँ !तब भगवान उसे अनुगीता का उपदेश करते हैं !इस से यह बात स्पष्ट समझ आती है !कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण रूप से हमेशा के लिए मोह से मुक्त नहीं हो सकता है !इसलिए उसे मोह के हमले से सुरक्छित रहने के लिए आत्मा या परमात्मा को अपने जीवन का सारथी बनाये रखना चाहिए !

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