Monday, 24 August 2015

विज्ञान अभी सौरमंडल में स्थित बहुत से रहस्योँ के प्रारम्भ तक नहीं पहुंच पाया है !अन्तरिक्छ इतना विशाल और विस्तृृत है  कि उसकी खोज आत्मज्ञान भी नहीं कर पाया है !जबकि पृथ्वी पर आत्मज्ञान से युक्त ऋषिओं और महर्षियोँ की एक बढ़ी श्रंखला रही है !भौतिक ज्ञान से जो अन्तरिक्छ की शोध बर्त मान काल में हो रही है वह बहुत खर्चीली और खतरों से भरी है !जबकि आत्मज्ञान से संयुक्त ऋषि मुनि अन्तरिक्छ  की शैर पृथ्वी पर टहलने जैसी गति से कर लेते थे !और उसमे व्यय और खतरा भी नहीं था !आकाश में जो एक पतली लकीर की तरह आकाश गंगा दिखाई देती है !उसमे २५०० करोड़ पृथ्वियां है  !सतयुग में ययाति नाम का राजा अहंकार के कारण स्वर्ग लोक से पतित होकरपृथ्वी पर गिरादिया गया था !जब उसके पुत्र अष्टक ने उस से जानना चाहा था की अंतरिक्छ में कितने लोक हैं !तब ययाति  ने कहा था कि पृथ्वी पर जितने धूल के कण  है !उतने लोक अन्तरिक्छ में विद्यमान  है !वैदिक   धर्म  ग्रंथोँ और ज्योतिष       शास्त्र के ग्रंथोँ में अन्तरिक्छ के रहस्योँ को उजागर किया गया है !जिनको भौतिक जगत के लोग कल्पना या गप्प मानते थे ! अब बे रहस्य विज्ञान से उजागर होने लगे

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