महाभारत में धर्मद्रोहियोँ के उत्कर्ष और अपकर्ष के कई आख्यान हैं ! युधिस्ठर जब अपने भाईओं के साथ दुर्योधन के छलकपट के कारण बनबास में कष्ट भोग रहे थे !और अधर्मी दुर्योधन राज्य लक्ष्मी का भोग कर रहा था ! और सम्राट पद पर आसीन था !उस समय बड़े दुखी मन से युधिस्ठर ने लोमश ऋषि से प्रश्न किया था ! कि हम सब भाई धर्म का आचरण करने के बाद भी कष्ट उठा रहे !और दुर्योधन जो की अधर्म का पूरा पंडित है !ऐश्वर्य और सुख भोग रहा है !और लोक में प्रतिष्ठित हो रहा है !इसका क्या कारण है ! ?लोमश ऋषि ने कहा था कि कभी कभी व्यक्ति अधर्म से भी शक्ति, संपत्ति, और वैभव तथा प्रतिष्ठा प्राप्त करता है !विजयी होता है! !लोकदृष्टि में पूज्य हो जाता है ! किन्तु अधर्म के कारण जड़मूल सहित नष्ट हो जाता है !इसिलए धर्मद्रोही विधर्मियों को अपने कुकर्मों का जैसा ईश्वरीय न्याय के तहत दंड की प्राप्ति होती है !ऐसा दंड तो देश का कोई न्यायलय नहीं दे सकता है !जो धर्मगुरु हैं ! बे धर्म का चोला ओढ़कर लोक परलोक की बात करते हैं !त्याग तपस्या वैराग्य सदाचार आदि का सदउपदेश देते हैं !किन्तु जब बे स्वयं भोग प्राप्ति के लिए और अवांछनीय बासनाओं की तृप्ति के लिए अपने उपदेशों का उल्लंघन करते हैं !तो भगवान के दंड विधान में उनके लोक और परलोक दोनों का नाश हो जाता है !जो श्रद्धालु धार्मिक लोगों में श्रद्धा करते हैं !उस श्रद्धा का कारण उनका पवित्र साधु वेश और धार्मिक उपदेश होते हैं !और श्रद्धालुओं का धर्म और लोक और परलोक में विश्वास होता है ! !इसीलिए श्रद्धालु इन धर्म के वेश में अधर्मी लोगों से ठगे तो जाते हैं !किन्तु ठगे जाने से उनको धन की हानि तोहोती है !किन्तु उनके धर्म का विनाश नहीं होता है !और ना ही उन्हें ऐसा दंड प्राप्त होता है !जैसा इन धार्मिक अधर्मियों को होता है !यह प्रत्यक्छ प्रमाण भी दिखाई देता है !कुछ धर्म गुरु जेलों में बंद हैं !ये राधे माँ भी उसी रास्ते पर हैं !और बे सभी धर्मगुरु जो भगवान के नाम पर लोगों को धर्म का चोला ओढ़ कर ठग रहे हैं ! और धोखा दे रहे हैं !बे भी पापकर्म पक जाने के बाद वहीं पहुचेंगे जहां और अधर्मी पापकर्मी बंद हैं! !इन अधर्मियों को दोहरा दंड भुगतना पड़ता है ! संसार में फजीहत और मरने के बाद रौरव नरकों की प्राप्ति !
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