Saturday, 22 August 2015

 किन्ही मंदिरों की व्यबस्था बंशानुसार चलती है !कुछ मंदिर ट्रस्टों या समितियोँ द्वारा संचालित है !तथा कुछ मंदिर राज्य की सरकारों के नियंत्रण में सरकारी अधिकारियों के संरक्छण में चलतेहैं !इसी प्रकार कुछ आश्रम मठ मंदिरों का भी संचालन होता है !इन सभी मंदिरों मठों आश्रमों में थोड़ा बहुत भ्रष्टाचार और दान के धन का दुरपयोग होता है !किन्तु सर्वाधिक दान के धन का दुरपयोग उन मंदिरों मठों आश्रमों में होता है जो सरकारी नियंत्रण में संचालित होते हैं !जो पुजारी मंदिरों में पूजा आदि का कार्य करते हैं ! और जो मंदिर की संपत्ति और दान आदि की व्यबस्था करते हैं  !उनमे थोड़ा बहुत भगवान में आस्था होती है !इसलिए बे दान और पद आदि का प्रयोग अपने हित में करते तो है !किन्तु भगवान की पूजा अर्चा पर भी ध्यान देते हैं !किन्तु सरकारी अधिकारी और कर्मचारियोँ की गीध दृष्टि सिर्फ धन प्राप्त करने की ही होती है !दान के धन का दुरपयोग सिर्फ हिन्दू मठ मंदिरों में ही नहीं होता है !यह दुरपयोग और बेईमानी सभी धर्मों में होती है !और यह तथ्य दान दाताओं की दृष्टि में भी होता  है !फिर भी बे स्वेक्छा से दान देते हैं !भले ही दानदाता धन का उपार्जन बेईमानी से करते हैं !किन्तु उनकी आस्था भगवान में होती है !और बे बेईमानी से उपार्जित धन की शुद्धि और अपने अपराधों की मुक्ति मंदिर को दान देने में मानते है !उनको दान देने से आत्मिक शांति प्राप्त होती है !जो लोग मंदिरों को दान देने का विरोध कर रहे हैं उनमे से अधिकाँश बे लोग हैं जिनकी धर्म और मंदिरों में आस्था नहीं है !और जो तथाकथित आचार्य मंदिरों को दान देने का विरोध करते हैं !बे स्वयं बेईमानी से उपार्जित धनवानों के गुरु बनकर बड़ी कारों में घूमते है !और धर्म का व्योपार कर रहे हैं !तथा आदर्श का मुखौटा ओढ़ कर अधर्म युक्त वैदिक धर्म विरोधी जीवन जी रहे हैं !इन लोगों को वह आस्था का स्थान बताना चाहिए जहाँ धन का दुरपयोग या गबन न होरहा हो !सरकारी गैर सरकारी सामाजिक शैक्छणिक स्वाास्थ्य और न्याय तथा गरीबों बंचितों के लाभ के लिए निर्मित संगठनो में घोर भ्रष्टाचार व्याप्त है !इस्लिये मंदिरों में दान देना बंद करने के बजाय मंदिर की व्यबस्था करने वाले लोगों का और पजारियों के चित्त शुद्धि की आवश्यकता है !भगवान श्री कृष्णा ने गीता  १८ (५)में कहा है कि यज्ञ दान और तप रूप कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए ! प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिए क्योँकि यज्ञ दान और तप ---ये तीनो ही कर्म मनीषियोँ को पवित्र करने वाले हैं ! मनीषी का अर्थ है विचारशील जो कार्य अपनी कोई कामना न रख कर दूसरों के हित के लिए किये  जाते  है ! बे कर्म पवित्र करनेवाले हो जाते हैं  ! अर्थात दुर्गुण दुराचार पाप आदि दोषों को दूर करके आनंद देने वाले हो जाते हैं ! परन्तु बे ही कर्म यदि अपनी स्वार्थ कामना की तुष्टि के लिए दूसरों का अहित करने के लिए किये जाएँ तो बे अपवित्र करने वाले महान दुःख दायक हो जाते हैं !इसलिए इन यज्ञ दान तप रूप कर्मों को तथा दूसरे भी कर्मों को आसक्ति और फलों की इक्छा का त्याग करके करना चाहिए ----यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है  १८(६) इसलिए मंदिरों को दान देना बंद करने के बजाय दान दाताओं और दान ग्रहीताओं की बुद्धि को परिमार्जित और हृदय को शुद्ध और पवित्र करने की आवश्यकता है !और इसकी जरुरत जीवन के सभी छेत्रों में है

No comments:

Post a Comment