आत्मज्ञान से भौतिक ज्ञान की भी प्राप्ति हो जाती है !किन्तु भौतिक ज्ञान
से आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है !भारत की भूतकाल की सारी भौतिक
समृद्धि आत्मज्ञान पर ही आधारित थी !आत्मज्ञान प्राप्ति के यंत्र आतंरिक
मन बुद्धि चित्त और अहंकार होते हैं !इन्हें बिभिन्न साधनाओं के द्वारा
राग द्वेष आदि से मुक्त करना पड़ता है !चित्त की चंचलता मन की व्यग्रता का
कारण भौतिक पदार्थों में अत्यंत अशक्ति है ! संसार तथा इसके संपूर्ण
पदार्थ विनाशी और गतिशील है !उनमे स्थिरता नहीं है !इसीलिए जब तक
मनुष्य इनके स्वरुप और स्वभाव को समझ कर इनसे मुक्त होने के लिए
तत्सम्बन्धी जीवन चर्या का निर्माण कर उनको आचरण मेनही उतारता तब तक उसको
अपने अंदर विद्यमान अजर अमर अविनाशी आनंद और शक्ति सामर्थ्य के अक्छय खजाने
आत्मा का अनुभव और उसका बोध नहीं हो सकता है !हिलते पानी में पड़ी हुई
वास्तु का दर्शन नहीं होता है !किन्तु जैसे ही पानी शुद्ध और शांत हो जाता
है !उसमे तत्काल पड़ी हुई बस्तु दिख जाती है ! चित्त की चंचलता और व्यग्रता
का नाश हो होते ही प्रकाशित तत्काल आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है !और
पुनर्जन्म का ज्ञान हो जाता हे
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