Sunday, 2 August 2015

राज्य व्यबस्था के स्वरुप बदलते रहते हैं !किन्तु प्रजा का पोषण ,.रक्छण, राष्ट्र रक्षा,  और राजधर्म के मूल्य अपरिवर्तनीय है! !किसी भी राजनैतिक व्यबस्था में जब राज धर्म लुप्त होने लगता है !तब राज्य व्यबस्था का नाश हो जाता है !विश्व पटल से बंशानुगत राज्य व्यबस्था का नाश राजधर्म के पालन ना करने के कारण ही होगया !और कुछ  राष्ट्रों को छोड़कर  लग भग सभी राष्ट्रों ने लोकतंत्र की राज्य व्यबस्था  को स्वीकार कर लिया !किन्तु बंशानुगत राज्य व्यबस्था के स्थान पर चुनाव  के माध्यम से जनप्रितिनिधियों के हाथ में राज्य व्यबस्था सौंपने के बाद भी लोकव्यबस्था में राज धर्म का पालन नहीं हो रहा है !महाभारत युद्ध में विजयी होने के बाद युधिस्ठर ने सर शैया पर पड़े राजधर्म के पालन में  पारंगत राज्य का राज धर्म से शासन  करने वाले भीष्म पितामह से प्रश्न पूंछते हुए कहा था ! राजधर्म संपूर्ण जीव जगत का परम आश्रय है  !यदि राजा प्रमाद और लोभ बस राज धर्म का पालन नहीं करता है ! तो राज्य की व्यबस्था बिगड़ जाती है, और लोग दुखी हो जाते हैं, जैसे सूर्य के  उदय होते ही घोर  अन्धकार का नाश हो जाता है ,उसी प्रकार राज धर्म मनुष्यों केअशुभ आचरणों का जो उन्हें सदाचारी जीवन जीने के मार्ग में बाधा बन जाता है !उसका निबारण राज धर्म से ही  होता है !जन प्रतिनिधियों का प्रथम दायित्त्व है प्रजा का रंजन अर्थ उसे प्रजा को प्रसन्न रखने के लिए स्वयं अपने कर्तव्यों का निर्बहन विधि विधान के अनुसार कर्त्तव्य निष्ठ हो कर करना चाहिए  !जो जन प्रितिनिधि गुणवान, शीलवान, मन और इन्द्रियों को संयम में रखने वाला, कोमलस्वभाव, कर्त्तव्य परायण, जितेन्द्रिय, सरलता और निरभिमान होकर जन हित के कार्य करने वाला और प्रजा को उसके न्यायोचित अधिकार प्रदान कराने वाले होते हैं ! बे ही सच्चे राजधर्मके पालन करने वाले कहे जा सकते हैं !और उन्ही से लोकतान्त्रिक व्यबस्था को गति और शक्ति प्रदान होती है !

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