जिस देश में अयोग्य व्यक्तियों का सम्मान और योग्य व्यक्तियोँ की उपेक्छा और अपमान किया जाता है !वह देश और समाज पतन के गर्त में डूब जाता है !यह नीति वाक्य है !किन्तु छोटों द्वारा बड़ों का अपमान करने से श्रेष्ठता की हानि और अपने आप आप अपनी प्रसंशा करने से पुण्य की हानि होती है ! अपनी प्रसंशा करने वाला व्यक्ति मृतक समान हो जाता है !इसका एक उदाहरण महाभारत में है !अर्जुन की यह गुप्त प्रतिज्ञा थी कि जो भी उनके गांडीव धनुष का अपमान करेगा उसका वह शीश काट लेंगे !एक बार युधिस्ठर ने क्रोध के आवेश में गांडीव की निंदा कर दी थी !अर्जुन ने एक दम म्यान से तलबार निकाल ली !भगवान कृष्णा ने देखा की कमरे में सिर्फ वह अर्जुन और युधिस्ठर ही हैं !फिर अर्जुन ने क्रोधबस किसको मारने के लिए तलबार उठा ली है !भगवान ने अर्जुन से पूंछा की यह तलबबार तुमने क्योँ उठा ली है !अर्जुन ने कहा मेरी यह गुप्त प्रतिज्ञा थी ! कि जो भी गांडीव की निंदा करेगा उसका में शीश काट लूंगा !युधिस्ठर ने गांडीव की निंदा की है इसीलिए इनका शीश काटने के लिए तलबार निकाल ली है !भगवान ने कहा कि तुमने बृद्ध पुरुषों की सेवा नहीं की है !इसीलिए तुम धर्म के मर्म को नहीं जानते हो !इसीलिए तुम यह जघन्य और अत्यंत निंदनीय काम करने के लिए तैयार हो गए हो !अपने से बड़े और पद में श्रेष्ठ पुरुषों की मृत्यु तो उनके अपमान करने से ही हो जाती है !तुम युधिस्ठर को तू कहकर इनका अपमान करदो तो इनकी मृत्युहो जायेगी !क्योँकि अपने से श्रेष्ठ पुरुषों की मृत्यु उनको तुम या तू कहने मात्र से ही हो जाती है !अर्जुन ने तदनुसार तू कहकर युधिस्ठर को अपमान जनक शब्द कह दिए !इसके बाद अर्जुन को अपने बड़े भाई का अपमान करने से बड़ी आत्मग्लानि हुई !और बे अपना गला काटने के लिए तैयार हो गए !तब भगवान ने कहा !अब तुम अपने मुह से अपनी तारीफ़ करो तो तुम्हारी भी मृत्यु हो जायेगी !सतोगुणी रजोगुणी और तमोगुणी भोजन के सम्बन्ध में गीता में भगवान ने १७(८,९,१० )में कहा है !कि श्रेष्ठ भोजन के पदार्थों का ही सेवन सुख समृद्धि प्राप्त कि कामना करने वालों को करना चाहिए जिस से उत्तम स्वास्थय और श्रेष्ठ बुद्धि की प्राप्तिहोती है !जिस घर में पति पत्नी प्रीति पूर्वक रहते हैं !उसी घर में सुख संपत्ति और लक्ष्मी का वास होता है !जिस घर में दूसरे दिन के लिए भोजन की व्यबस्था ना हो उस गृहस्थ से अधिक भाग्य हीन और कोई नहीं होता है !निष्क्रिय निकम्मा औरदूसरे के भोजनालय में भोजन के लिए आश्रित व्यक्ति और प्रपंच में फसा हुआ सन्यासी दोनों ही नरकगामी होते हैं !शाश्त्रों में गृहस्थ धर्म के पालन के के लिए इस प्रकार के अनमोल शब्द बिखरे पड़े हैं !इनका पालन कर गृहस्थों को अपना जीवन सुखी स्वस्थ और समृद्ध बनाना चाहिए !
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