Tuesday, 11 August 2015

संथारा आत्महत्या नहीं है !संथारा को आत्महत्या कहना इस सम्बन्ध में घोर अज्ञान को दर्शाता है !जैन धर्म कायिक मानसिक  और वाचिक अहिंसा को आत्मानुभव का एक मात्र आधार मानता हैं !जो जैन मुनि आचार्य  उपाध्याय या श्रावक होते हुए भी आत्मा की प्राप्ति को ही अपने जीवन का ध्येय बना लेते हैं !बे शरीर को आत्मानुभव की प्राप्ति के लिए साधन मात्र मानते है !और विनाशी शरीर का उपयोग बे अविनाशी आत्मा के अनुभव प्राप्ति के लिए करते हैं !इसिलए जब तक शरीर रूपी वाहन या यन्त्र आत्मानुभव के लिए उपयुक्त होता है !तभी तक बे इसे धारण करते हैं !और जब यह रोग और व्याधियों से ग्रस्त हो जाता है !या आयु बृद्धि के कारण जर्जर और आत्मसाधना के लिए अनुपयुक्त हो जाता है !तब बे इसे प्रसन्नता पूर्वक इसके पोषण करने वाले अन्न जल का त्याग कर देते हैं !और मृत्यु में आत्मशांति में डूब कर समाधि सुख का अनुभव करते हैं !इसीलिए इसको समाधि मरण और संलेखना आदि नामो से भी पुकारा जाता है ! बहुत से जैन मुनि आचार्य आदि  शरीर को रोग मुक्त करने के लिए किसी भी प्रकार की औषधि ग्रहण नहीं करते हैं !यह समाधि मरण सिर्फ जैन संत ही नहीं करते हैं !वैदिक धर्माबलम्बी सन्यासी ,साधू आदि भी शरीर के ज़रा जीर्ण या व्याधि ग्रस्त होने पर अन्न जल त्याग कर समाधी मरण को ग्रहण करते हैं !बहुत से गृहस्थ  भी इस तरह की मृत्यु को वरण  करते हैं !जो लोग शरीर और आत्माकी पृथकता को जानते है !और शरीर विनाशी है !तथा आत्मा अजर और अमर तथा अविनाशी और अक्छय आनंद का श्रोत है !बे आत्मानंद के मार्ग में बाधा उत्पन्न करने वाले  रोग आदि से ग्रस्त शरीर को तिनके की भाँती त्याग देते हैं !सामान्य व्यक्ति मृत्यु से बहुत भयभीत रहते हैं ! और उसको रोकने के लिए सभी संभव प्रयत्न  भी करते हैं !ऐसे लोग प्राणो कात्याग होश हवाश  में चैतन्य स्थिति में नहीं करते हैं !जबकि संथारा में मृत्यु का वरण पूरी चेतनता से आनंद पूर्वक किया जाता है !आचार्य विनोबा भावे ने भी शरीर को आत्मसाधना के लिए अनुपयुक्त मानकर अन्न जल त्याग कर आनंद पूर्वक समाधि मरण का वरण किया था !राजस्थान उच्च न्यायलय का संथारा को आत्महत्या बताने वाला निर्णय सही नहीं है !जैन समाज को इस फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी चाहिए

No comments:

Post a Comment