Thursday, 13 August 2015

धर्म से दो धाराएं प्रवाहित होती है (१)अधर्म की (२) अध्यात्म की !धर्म अध्यात्म की धारा प्रवाहित कर रहा है !या अध्यात्म  की इसका पता भी धर्म से चलता है !धर्म ही अधर्म और अध्यात्म की बुनियाद में है !आजकल दान का दुरपयोग सिर्फ मंदिरों में ही नहीं हो रहा है !अगर मंदिर दान का दुरपयोग कर रहे हैं !तो जिन श्रद्धालुओं की मंदिर में विराजमान भगवान के बिग्रहों में आस्था और विस्वास सेकंडों साल से है !उनको अपनी आस्था और विस्वास क्या इन बाबाओं के आश्रमों में केंद्रित कर इनकी पूजा उपासना शुरू कर  देनी चाहिए !जो वैदिक सन्यास को कलकिंत कर रहे हैं !और स्वयं आकंठ सभी प्रकार के भोग भोग रहे हैं !धर्म का सम्बन्ध सीधा अध्यात्म से है !जो इसका प्रयोग निजी स्वार्थों के पोषण के लिए कर रहे हैं !उनके दंड का विधान धर्म में ही दिया गया है !वैदिक धर्म पुनर्जन्म को मानता है !और इसके साथ यह भी स्वीकार करता है !की प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है !इस सम्बन्ध में एक घटना कल्याण में प्रकाशित हुई थी !एक कुए में एक मेढक रहता था !संयोगबस उसका अकार इतना बढ़ गया की कुँए से पानी लेना बंद हो गया !एक व्यक्ति जानबूझ कर उसकी पीठ अपनी बाल्टी मारकर तोड़ देता था !उसने भगवान से प्रार्थना की भगवान ने प्रगट होकर बाल्टी से चोट पहुंचाने  वाले के लिए !दंड के लिए मेढक से पूंछा !मेढक ने कहा की भगवान उसको आप किसी मठ का महंत बना दीजिये !भगवान ने कहा की तुम उसे दंड दे रहे हो या पुरुष्कार !मेढक ने कहा भगवान  में पहले जन्म में एक बहुत बढे मठ का महंत था !किन्तु मेने धर्म का चोला पहन कर अधर्म किया इसीलिए मुझे इस जन्म में मेढक होना पड़ा है !यह मुझे अनावश्यक पीड़ित कर रहा है !इसीलिए मै चाहता हूँ की इसे भी आप किसी मठ का महंत बना दीजिये !यह व्यबस्था पाखंडियों के लिए धर्म में ही मौजूद है !अगर मंदिरों की व्यबस्था पुजारियों और देवस्थानों से छीन कर सरकार को सौंप दी जाए !तो आप कल्पना कर सकते हैं !की मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान का क्या होगा ?व्यबस्थापक मंदिर के दान का दुरपयोग ना कर सकें  !,भगवान को बेचें नहीं आदि में सुधार अवश्य होना चाहिए !किन्तु वह सुधार मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में देकर नहीं होना चाहिए !कृपया विरोध करने वाले सन्यासियों  संतों के  जीवन पर दृष्टि पात करिये !और वैदिक धर्म के संन्यास  संत और साधु परम्परा को मालूम कीजिये !तो आपको पता चलेगा !ये सभी संत संन्यास परम्परा का पालन नहीं कर रहे हैं !फिर धर्म में अधर्म देवस्थानों के दान का दुरपयोग सिर्फ हिन्दू मंदिरों में ही नहीं हो रहा हैं !विश्व के छोटे बड़े सभी धर्म अधर्म से व्याप्त हैं !कुछ धर्म तो स्वभाव से ही अधर्म पोषक हैं !वैदिक धर्म से ही अनेक ईश्वर कोटि के महापुरुष निकले हैं !और आज भी निकल रहे हैं !

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