देश में विचार स्वातंत्र है !इसिलए जब तक लोगों को भय ना हो तबतक वे स्वतंत्रता पूर्वक विचार व्यक्त करते हैं !किन्तु अगर जान जाने का खतरा हो !सम्पति छिन जाने की स्थिति हो !या जेल यात्रा का भय हो !तो फिर विचार व्यक्त करने वालों का अकाल पड़ जाता है !फिर बे ही चन्द लोग निर्भयता पूर्वक अपनी बात कह पाते हैं !या कहते हैं जो विचार कीअभिव्यक्ति को या विचारनिष्ठा को अपने जीवन का अहम कर्त्तव्य मान कर जीते है !और इसके लिए सबकुछ बलिदान करने के लिए तैयार रहते हैं !जो विचार की अभिव्यक्ति को इस स्तर तक जीते हैं वे ही समाज का परिवर्तन और व्यबस्था में सुधार कर पाते हैं !समाज और देश का संचालन किसी व्यबस्था के अक्न्तर्गत ही होता है !और व्यबस्था निर्माण करनेवाले ,उसका संचालन करने वाले, उससे संचालित होने वाले ,और व्यबस्था को बिगाड़ने वाले ,उससे लाभ उठाने,, और शोषित और पीड़ित और ठगे जाने वाले मनुष्य ही होते हैं !मनुष्य ही पालक, पालित, और घालक होता है !मनुष्य के आखिर इतने सारे रूप क्योँ हो जाते हैं ?मनुष्य ही क्रूर और दयाबान क्योँ हो जाता है ?एक ही कक्छा में पढ़ने वाले और एक्सा ही कोर्स पढ़ने वाले विद्यार्थियों में कुछ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो जाते हैं !और कुछ कनिष्ठ श्रेणियों में और कुछ फ़ैल भी हो जाते हैं ?इसका समाधान भौतिकवादी लोग सामाजिक व्यबस्था के बदलाव में लाने में खोजते हैं !और प्रचिलित राज्य व्यबस्था पर ,धर्म पर कठोर प्रहार करते हैं !उनका कथन होता है !की वर्तमान समय की सारी परेशानियों हिंसा गरीबी असमानता भुखमरी की जड़ ये राज्य और धर्म ही है !राज्य बेईमान लोगों का संरक्छण करता है !!और धर्म लोक परलोक का लालच देकर लोगों की बुद्धि पर ताला लगा देता है !धर्म और राज्य व्यबस्था पर हमला करने वाला एक दर्शन साम्यबाद के रूप में जन्मा और उसकी भी जिन देशों ने उसे स्वीकार किया था ! वहीं समाप्ति हो गयी ! आने वाला समय किसी अन्य व्यबस्था को समाजिक उन्मत्तता और प्राकृतिक जीवनचर्या के आधार पर राज्य और धर्म से मुक्त व्यबस्था के निर्माण की सम्भावना तलाश रहे हैं ! इस व्यबस्था के तलाशने वाले लोग पहले अपने ही चार छै लोगों के बीच इसका क्रियानबन करके देखें !उसका अनुभव लें !अगर बे वहां सफल हो जाएँ !तब फिर इस प्रकार की व्यबस्था को अपने आचरण से सिद्ध कर समाज का विश्वास जीतें !फिर इसकी बात करें
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