Friday, 1 April 2016

विविधता में एकता ---------------विनोबाजी ने लिखा है कि भारत की एकता का दर्शन मुझे ऋग्वेद में हुआ उसके एक सूत्र में कहा है-------- द्वाबिमऔ बातों बातःआ सिन्धोः आपरवतह------- अर्थात भारत में दो वायु बहती हैं एक जाती है परावत से सिंधु की तरफ और दूसरी समुद्र से परावत की तरफ ! सिंधु यानी दक्छिन महासागर और परावत यानी हिमालय की गुहा ! समुद्र की तरफ से मानसून की हबाएं बहती हैं ! और हिमालय की तरफ से भारत के पूर्व की ओर हबाएं बहती हैं इस तरह ऋग्वेद में सिंधु से पराबत तक अपने देश की मर्यादा मानी है  ! विविध भाषाओँ को मान्य करके सारा देश एक मानना भारतीय  संस्कृति ही है ! भारत के ऋषियों और महृषियों ने  आत्मसाधना ,त्याग और तपश्या से दिव्यदर्शन किया कि भारत बड़ी पुण्यभूमि है ! वे भारत में भ्रमण करके लोगों को प्रेरणा देते थे कि उनको इस पुण्यभूमि की यात्रा करनी चाहिए ! इस पुण्यभूमि भारत में अनादिकाल से ऋषियों मुनियों ,महर्षियों के साधना स्थल रहे काशी, ,रामेशवरम, बद्रीनाथ ,जगन्नाथ ,द्वारिका और अन्य पवित्र तीर्थ छेत्र दर्शन  से लोगों को अपने आप को पवित्र करना चाहिए ! उन दिनों यात्रा के उत्तम साधन नहीं थे फिर भी लोग इन पवित्र स्थानोे दर्शन करने के लिए कष्ट सहन कर भी यात्रा करते थे ! यह भावना आध्यात्मिक होने के साथ राष्ट्रीय भावना भी थी ! हमारा देश बड़ा है ! किन्तु यह देश यों ही बड़ा नहीं बनगया ! इसके पीछे महान संस्कृति और सभ्यता पडी है ! बहुत लम्बे साधना ओर तपस्या के   प्रयत्न से यह सम्भव  हुआ है  !उसी के परिणाम स्वरुप यह देश बड़ा बना है ! अनेक भेद होते हुए भी हमारे पूर्वजों ने एक राष्ट्र की भावना हमारे चित्त में इस भांति बैठा दी उसका ऐसा बंदोबस्त किया कि आश्चर्य होता है ! तमिलनाडु ,कर्णाटक ,या महाराष्ट्र का मनुष्य स्नान के लिए कावेरी ,तुंगभद्रा ,या गोदावरी पर जाएगा तो कहेगा कि में गंगास्नान के लिए जाता हूँ ! भारत में अनेक भाषायें और अनेक धर्म हैं फिर भी हम अपने को एक देश के निवासी मानते हैं ! हमारा यह भारत देश अत्यन्त वैभव शाली है ! समस्त पृथ्वी में जो बैभव है वह भारत में हैं ! पृथ्वी में अनेक धर्म हैं ,तो हमारे देश में भी अनेक धर्म हैं ! पृथ्वी में अनेक मानव बंश हैं ,तो हमारे देश में भी हैं ! पृथ्वी में अनेक भाषायें हैं लेकिन अनेक समर्थ भाषाओँ को एक साथ निभानेवाला भारत जैसा दूसरा देश पृथ्वी पर नहीं है ! ऐसा अपना यह विशाल भारत है ! इस विशाल भारत की आध्यात्मिक त्यगयुक्त सर्व धर्म लोकोपकारी ओर जनहित कल्याणकारी कारी करुणा प्रधान अहिंसक  परंपरा और ज्ञान गंगा को सुरक्छित और संरकछित तथा पोषण करने का कर्त्तव्य प्रत्येक भारतीय का है !जो इस पुण्यभूमि भारत में जन्मता है !इसका अन्न जल खता है !और मरकर इसी देश की मिट्टी में जलजाता है या दफ़न हो जाता है !यह पुण्यभूमि भारत माता सभी प्रकार से वंदनीय और पुजयनीय हैं !जो इस भारतमाता के उपासक नहीं हैं बे कृतघ्नी हैं !      

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