विश्व पुस्तक दिवस ------शव्द ज्ञान यदि अनुभव और आचरण में नहीं उतरता है !तो यह पाखण्ड ,दम्भ ,छल ,कपट का श्रोत बन जाता है !फिर ये शव्द ग्यानी समाज का मानसिक स्वस्थ्य नष्ट करने का काम करते हैं !ये कपट कला के विशेषज्ञ अपनी प्रतिष्ठा के पोषण के लिए और भौतिक समृद्धि प्राप्त करने के लिए उत्तम शव्दों का जाल प्रकाशन के भिन्न भिन्न माध्यमों से फैलाकर अपसंस्कृति का निर्माण करते हैं !कथनी और करनी का अंतर इन शव्द ज्ञानियों में तो होता ही है !इनका अनुकरण समाज के लोग भी करने लगते हैं !शुद्ध पदार्थ बेचने का बोर्ड लगाने वाले मिलावटी पदार्थ बेचते हैं !डाकटर,नेता ,अधिकारी ,कर्मचारी ,शिक्छक ,अधिवक्ता ,व्योपारी ,पारिवारिक सम्बन्धों ,धार्मिक प्रवचनों ,जातीय संगठनों ,लेखन कार्य करने ,समाज सेव करने वाले संगठनों प्रवन्ध समितियों अदि में ये शव्द ज्ञानी असत्य ,छल ,कपट ,दम्भ ,और अपनी प्रशंसा अदि के दुर्गुण प्रवेश कराकर मानवीय मूल्यों के स्थान पर राकछसी ,आसुरी जीवन पद्धति का प्रवेश करा देते हैं ! इसीलिए भारत की अदि संस्कृति ग्रन्थ प्रधान रही है !ग्रन्थ अध्यात्म ज्ञान के अनुभव के प्रकाशक होते हैं !जिनके अध्यन ,मनन ,चिंतन से आत्म ज्ञान और आत्म विकास होता है !जैसे गर्मी का अनुभवपहले होता है और शव्दों में प्रगट बाद में होता है !उसी प्रकार अध्यात्म ज्ञान का अनुभव ऋषियों में पहले उतरा और अध्यात्म ज्ञान का प्रगटीकरण ग्रंथों में बाद में होता है !जैसे कूलर ,पंखे ,येसी अदि उपकरणों का निर्माण ताप के कष्ट निवारण के लिए हुआ है !उसी प्रकार ग्रंथों में ग्रथित अध्यात्म ज्ञान का उद्भव मनुष्यों के काम ,क्रोध ,लोभ तृष्णा ,लालच ,क्रूरता ,दम्भ ,पाखण्ड झूठ ,अदि दुर्गणों के विनाश और सद्गुणों के विकास के लिए हुआ है !जिस प्रकार माता सीता का अपहरण काम तृप्ति के लिए दुराचारी रावण ने कर लिया था !किन्तु वह दुराचारी भी माता सीता के पवित्रता के तेज की कारण अपनी अत्यन्त छुद्र काम वासना का हेतु माता सीता को बनाने में विफल रहा था !और अंत में उसका सर्व नाश हो गाय था !जैसे बादलों में छिप जाने से सूर्य का प्रकाश कुछ काल के लिए छिप जाता है !किन्तु बदल विनिष्ट हो जाते हैं !और सूर्य यथाबत प्रकाशित होता रहता है !उसी प्रकार से भारत का ग्रंथों में ग्रथित अध्यात्म ज्ञान ढपोल शंखी पुस्तक ज्ञान से ढक गया है !ग्रन्थ ज्ञान के अभाव के कारण संपूर्ण विश्व क्रूर हिंसा ,और अशांति से ग्रस्त हो गया है !इसका निवारण आत्मज्ञान से ही होगा !और वह भारत के ग्रंथों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है ! भारत में आत्मज्ञानी भी हैं !किन्तु बे ढपोल शंखी शव्द ज्ञानियों के कारण प्रकाशित नहीं हैं !जबतक ढपोल शंखियों का वर्चस्व रहेगा !तब विश्व मानवता पीड़ित ही रहेगी !जैसे नमक में शक्कर का स्वाद उत्पन्न नहीं किया जा सकता है ! वैसे ही इन तथाकथित विश्व पुस्तक दिवस अदि के मनाने से अज्ञान के अन्धकार का नाश नहीं हो सकता है !अगर मात्र पुस्तकों के संग्रह ,पठन ,पाठन से अज्ञान का निवारण संभव होता तो सभी शव्द ग्यानी दम्भ ,पाखण्ड अदि दुर्गुणों से मुक्त हो गए होते !
No comments:
Post a Comment