साधु संत महाब्रती होते हैं ! इन ब्रतों का एक मात्र उद्देश्य भोग वासनाओं को समाप्त कर अपने पूज्य इष्ट की प्राप्ति या आत्मजागृति होती है ! प्राचीन काल से संतों की यह ब्रतनिष्ठा चली आरही है !शरीर को परमात्मा की साधना में लगाने के लिए जितने अन्न जल की आवश्यकता होती है !मात्र उतना ही अन्न जल संत ग्रहण करते हैं !कुछ संत अश्मकुट्टक होते हैं !अर्थात वे पक हुआ अन्न ग्रहण नहीं करते हैं !सिर्फ पत्थर से फोड़कर भोज्य पदार्थ ग्रहण करते हैं !कुछ संत मरीचिप होते हैं !अर्थात सिर्फ सूर्य किरणों से ही अपना उदर भरते हैं !कुछ परिपुष्टक और विघस अन्न ग्रहण करते हैं ! कुछ शिल बृत्ति और उन्छ बृत्ति से भोजन ग्रहण करते हैं !ऐसे अनेकों प्रकार के महाब्रती संतों के दर्शन कुम्भ में हो सकते हैं !ऐसे महाब्रती संत आमतौर पर देखने में नहीं आते हैं !
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