Wednesday, 20 April 2016

जहाँ श्री कृष्णा और सुदामा ठहरे थे उस स्थान को महत्त्व प्रदान कर उसको स्मरणीय बनाने के लिए मित्र स्थल के रूप में उसका नामकरण करना प्रसंसनीय कदम है !किन्तु महाभारत काल की गरीवी का आज के सन्धर्वों में प्रयुक्त करना ठीक नहीं है !आज के गरीवी अमीरी के मानदंड उस समय के गरीबी अमीरी के मान दण्डों से भिन्न है !भौतिक पदार्थोँ की अधिकता या राजा के रूप में प्राप्त शक्ति की मान्यता समाज में श्रेष्ठता के रूप में नहीं थी और नहीं भौतिक पदार्थो की प्राप्ति के के लिए सामान्य प्रजा में अनैतिक साधनो से संपत्ति प्राप्त करने की होड़ थी !भौतिक पदार्थो और राज शक्ति का त्याग आत्मिक शक्ति को जाग्रत करने के लिए आवश्यक उपाय समझा जाता था !ब्राह्मण का शरीर भोग पदार्थो के लिए नहीं योग प्राप्ति का साधन था !ब्राह्मण का जीवन गुण प्रधान होता था भोग प्रधान नहीं !भगवान श्री कृष्णा ने गीता में ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म १८(४२)में बताते हुए कहा है कि मन का निग्रह करना इन्द्रियों को वष में करना धर्म पालन के लिए कष्ट सहना बाहर भीतर से शुद्ध रहना दूसरे के अपराधोँ को छमा करना शरीर नाम बुद्धि आदि तथा धार्मिक कार्य सरलता पूर्वक करना वेद शास्त्र आदि का स्वाध्याय चिंतन मनन कर उनको अपने आचरण में धारण करना पारमार्थिक प्रजा कि और खुद कि आत्मतत्त्व कि प्राप्ति के लिए लोकोपकार के यज्ञ आदि विधि पूर्वक संपन्न करना तथा कराना परमात्मा कि प्राप्ति को ही जीवन का एकमात्र ध्येय बनाना ये सब ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं !सुदामा भी इन्ही सब स्वाभाविक कर्मों का पालन करते थे !इसलिए वह अपने बाल सखा श्री कृष्णा से मिलने तो गए थे किन्तु उन्होंने उनसे याचना नहीं कि थी !इसलिए सुदामा कि गरीबी में भौतिक बस्तुओं का आभाव तो था किन्तु दीनता नहीं थी !उसमे ब्राह्मणत्वव का तेज था !और स्वधर्म पालन कि श्रेष्ठ वृत्ति थी

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