श्रिष्टि
का रचने वाले भगवान है या यह अपने आप बिना किसी के बन गयी !यह दार्शनिक
विवाद तो कभी ख़त्म नहीं होगा !किन्तु जब से श्रिष्टि बनी है तब से सभी
प्राणिओ के दिल दिमाग ऑंखें सभी आगे लगी हैं तथा सभी प्राणी गति भी आगे की
ओर करते हैं !जितनी भी पवित्र धार्मिक पुस्तकें है और जितने भी भगवान या
भगवान के दूत या ऋषि और महापुरुष पृथ्वी पर आये हैं !उन सभी ने सभी
प्राणिओं में संचारित जीवन को सुन्दर सुरक्षित गतिशील बनाने की विधियां
अपने अपने समय में काल और परिश्थिति के अनुसार प्रस्तुत की हैं
!किन्तु उपदेश का सार यही रहा है की श्रिष्टि में जितने भी जीव धारी हैं
उनका जीवन सिर्फ काल या स्वाभाविक मृत्यु द्वारा ही समाप्त हो मनुष्य को यह
अधिकार नहीं है कि वह किसी जीव धारी को अपने किसी पूर्व प्रचलित धार्मिक
मान्यता के आधार पर उसको अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए नष्ट करे !पशु जगत में
यह नियम लागू नहीं है !किन्तु मनुष्य अपनी व्यबश्था खुद बनाता है और उसमे
काल समय और परिशिश्थिति के अनुसार बदलाओ भी करता है ! और सुख दुःख मान
अपमान हानि लाभ आदि घटनाओं से प्रभावित होकर सुखी और दुखी भी होता है
!इसीलिए उस पर यह विशेष उत्तर दायित्त्व है कि वह ऐसे किसी कार्य को ना करे
जिस से प्राणिओं को दुःख की प्राप्ति हो या जीवन हानि हो! !किन्तु ऐसा
तमाम धर्मों और धर्म ग्रंथो और महापुरुषों के उपदेशों के बाद भी मानव जीवन
में दिखाई नहीं देताहै !और स्थिति तब ओर अत्यंत विकट हो जाती है जब पशुओं
पक्छिओं और दूध देने वाले जानवरों को मारने और खाने की पुष्टि धर्म से
स्वीकृत होने की बात जोर शोर से कही जाने लगाती है !लोग यह समझने की भूल कर
बैठते हैं कि धर्म ग्रंथों में जो सनातन बात है वह है सत्य अहिंसा
ब्रह्मचर्य अस्तेय और अपरिग्रह! और इन्ही सनातन सत्यों से जीवन को विकसित
सुन्दर और समर्थ बनाने के के लिए ऋषि पैगम्बर या ईश्वर के पुत्र या गुरु
या भगवान काल समय और परिश्थिति के अनुसार जीवन में धारण करने के नियम
बताते और बनाते हैं!प्रत्येक देश की जलवायु परिश्थिति एक सी नहीं होती है
!इसलिए धार्मिक आचरण परमात्मा की पूजा रहन सहन आदि की क्रियाएँ भी उन्ही
देशों में जन्मे धर्मों के अनुसार ही होती हैं !इसलिए धार्मिक आचरण तो देश
काल के अनुसार ही होगा !किन्तु धर्म का लक्छ्य जीवन की रक्षा करना सभी
धर्मों में समान होना चाहिए! मक्का में जन्म लेने वाले इस्लाम या इजराइल
में जन्म लेने वाले ईशा के धर्म का आंतरिक स्वरुप शांति और सेवा भाव सद्भाव
प्रेम आदि को तो भारत भूमि में स्वीकार किया जा सकता है और अवश्य स्वीकार
किया जाना चाहिए ! किन्तु उनकी उपासना या आचरण पद्धत्ति को भारत की
परिश्थित में स्वीकार नहीं किया जा सकता है !और ना ही भारत भूमि में धर्म
परिवर्तन होना चाहिए ! क्योँकि जिन धर्मो का जन्म भारत भूमि में नहीं हुआ
है, उनकी पूजा पद्धति यहाँ की धार्मिक पूजा पद्धति से भिन्न है !किन्तु आज
के युग की आवश्यकता पूजा पद्धति पर जोर देने की नहीं है !आचरण में सत्य
अहिंसा त्याग प्रेम करुणा और भाई चारा उतारने की है जो मानवता की रक्षा
सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है
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