भगवान
परशराम का फरशाधारण किये हुए रूप का ही चित्रण और वर्णन आजकल प्रमुखता से
किया जारहा है !और उनको छत्रिय राजाओं के विनाशक के रूप में ही प्रस्तुत
किया जाता है !आजकल ब्राह्मण परशराम जी के साथ चाणक्य का भी पूजन करने लगे
है !ब्राह्मण बंधू इन दो को एक को भगवान के रूप में अपना आदर्श मानते है और
दूसरे महान पुरुष के रूप में अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं !किन्तु इन
दोनों के काल खंड और कार्य छेत्र भिन्न भिन्न होने के बाबजूद उनकी महानता
का आधार त्याग और तपस्या ही था !और दोनों के ही जीवन
में इसका स्पष्ट दर्शन होता है !भगवान परशररम छत्रिय विरोधी नहीं थे !उनकी
दादी सत्यवती और माँ रेणुका दोनों ही राजाओं की पुत्रियां थी !और महाभारत
काल में जो उनका भीष्म से युद्ध हुआ वह भी एक छत्रिय कन्या को न्याय दिलाने
के लिए हुआ !और वह भी उनके बाल सखा राजऋषि होत्रवर्ण के कहने से हुआ था !
परशु राम के छात्र कर्म को ऋचीक भृगु आदि ने स्वीकार नहीं किया था !और अंत
में भगवान परशुराम ने मन को एकाग्र करके ध्यान योग का साधन किया और इस
ध्यान रूपी फरसे से उन बलशाली भगवान परशुराम समस्त इन्द्रियों को परास्त कर
दिया बे ध्यान योग के द्वारा आत्मा में प्रवेश करके परम सीधी को प्राप्त
हो गए !तथा बे घोर तपस्या में लग गए !और इस से उन्हें परम दुर्लभ सिद्धि
प्राप्त हुई !महाभारत काल में उनके ब्राह्मणोचित तपस्या से अहिंसा युक्त
चित्त का दर्शन जब होता है !जब भगवान श्री कृष्णा से अन्य ऋषियों असित देवल
नारद आदि के साथ मार्ग में मिलते है जब भगवान श्री कृष्ण कौरवों पांडवों
में मैत्री स्थापना के लिए हस्तिनापुर जाते हुए इन ऋषियों को देख कर रथ से
उत्तर कर इनका अभिवादन करते हैं !तब भगवान परशराम यह कहते हैं कि हम सब का
कौरव सभा में धर्म नीति सद्भाव और अहिंसा युक्त प्रवचन सुन ने के लिए जारहे
हैं !और कौरव सभा में भगवान परशुराम दुर्योधन को दम्भोद्भव की कथा सुनाकर
युद्ध न करने की सलाह देते है !और श्री कृष्ण के शांति प्रस्ताव का समर्थन
करते हैं !चाणक्य भी चन्द्र गुप्त मौर्य का महा अमात्य तो बना !किन्तु वह
झोपड़ी में ही रहा !पहनने के लिए धोती ओढ़ने के लिए चादर और जल के लिए मिटटी
का घड़ा इसके अलावा और कोई भौतिक वास्तु चाणक्य के पास नहीं थी !भगवान
परशुराम ने भी संपूर्ण पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी थी !जब द्रोणा
चार्य उनके पास अस्त्र सस्त्र आदि की शिक्छा ग्रहण करने गए !तब भगवान
परशुराम ने उनसे कहा था की मेरे पास देने के लिए सिर्फ यह शरीर है !या
विद्या है !तुम इन दोनों में से जो चाहो ले सकते हो !इस प्रकार ब्राह्मणत्व
की त्याग और तपस्या का सन्देश ही भगवान के रूप में परशराम से प्राप्त
होता है !और महापुरुष के रूप में चाणक्य से !
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