भूख आत्मसम्मान की भी होती है ! इसका प्रगटीकरण सामान्य मनुष्यों में शरीर सम्मान के रूप में प्रगट होता है ! इसीलिए मनुष्यों ने आत्मसम्मान के रूप में शरीरों के सम्मान के अनेकों मंच रच लिये हैं ! किन्तु समाज को सही रचनात्मक गति और दिशा देने वाले तो वही व्यक्ति होते हैं जो शरीर को आत्मसम्मान के लिए समर्पित कर देते हैं ! डॉ भीमराव आंबेडकर ऐसे ही व्यक्तियों में से थे ! किन्तु आज के समय में शरीर सम्मान के भूखे लोगों ने उनको भी शरीर सम्मान का शशक्त माध्यम बन लिया है ! गांधी जी ने कहा था कि डॉ आंबेडकर में त्याग शक्ति है कुर्बानी करने की शक्ति है ! गांधी जी भी हिन्दू धर्म में अश्पृश्यता के घोर विरोधी थे ! और अम्बेडकर भी अश्पृश्यता निवारण के लिए कृत संकल्पित थे ! किन्तु गांधीजी हिन्दू धर्म में अश्पृश्यता को पाप मान कर इसका शोधन करना चाहते थे ! किन्तु अम्बेडकर हिन्दू धर्म को ही त्यागना चाहते थे और उन्होंने बौद्ध धर्म का वरण कर हिन्दू धर्म त्याग दिया था ! गांधी जी ह्रदय से आंबेडकर का बड़ा आदर करते थे !उन्होंने अपने एक लेख में १९३६ की एक घटना का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है ! लाहौर (उस समय पाकिस्तान नहीं बना था) में वहां के जाति .पांत तोड़क मंडल का बार्षिक अधिवेशन होने वाला था और अम्बेडकर उसके सभापति चुने गए थे ! लेकिन डॉ अम्बेडकर ने उसके लिए जो भासणतैयार किया था उसको स्वागत समिति ने स्वीकार नहीं किया था इस कारण से वह अधिवेशन ही निरस्त हो गया था ! डॉ अम्बेडकर ने स्वागत समिति की अस्वीकृति के बाद भी अपना भासन अपने ही खर्च से प्रकाशित कर दिया था और उसकी कीमत ८ आने राखी थी ! गांधी जी ने सुझाव दिया था कि अम्बेडकर का भासन ज्यादा ज्यादा से लोग पढ़ सकें इसीलिए उसकी कीमत २आने कर देनी चाहिए गांधीजी ने लिखा था कि डॉ आंबेडकर का वह भासण ऐसा था कि कोई भी सुधारक उसकी उपेक्छा नहीं कर सकता था ! डॉ अम्बेडकर हिन्दू धर्म के लिए एक चुनौती थे ! हिन्दू की तरह पलने और एक हिन्दू राजा के द्वारा शिक्छित किये जाने पर भी सवर्ण कहे जाने वाले हिन्दुओं द्वारा अपने और अपनी जाति वालों के साथ होने वाले व्योहारों से वह इतने निराश हो गए थे कि वह ना केवल उन्हें बल्कि उस धर्म को भी छोड़ने का विचार कर रहे थे जो उनकी और सभी हिन्दुओं की संयुक्त विरासत है ! डॉ अम्बेडकर का यह मानना था कि सवर्ण हिन्दुओं ने उनको और उनकी जाति वालों को अश्पृश्य शुमार करने में हिन्दू धर्म शास्त्रों का भी आदेश है ! इसके प्रमाण में उन्होंने शास्त्रों से बहुत से श्लोक भी उद्धृत किये थे १----शास्त्रों में निर्दय व्योहार करने के आदेश हैं २------ऐसा निर्दय व्योहार करने वालों का समर्थन किया गया है ३-----परिणाम स्वरुप यह अनुसंधान किया गया है कि इस निर्दयता का समर्थन शास्त्र सम्मत है ! ऐसा कोई भी हिन्दू जो अपने धर्म को अपने प्राणो से अधिक प्यारा समझता है इस दोषारोप की गम्भीरता की उपेक्छा नहीं कर सकता है ! डॉ अम्बेडकर जो बात कहते हैं कम या ज्यादा जोश के साथ वही बात दलित जातियों के और नेता भी कहते हैं फर्क सिर्फ इतना है की दूसरे जैसे -----राव बहादुर एम सी राजा.और दीवान बहादुर श्रीनिवासन अदि हिन्दू धर्म छोड़ने की धमकी नहीं देते हैं ! सवर्ण हिन्दुओं को अपने विश्वास और आचरण में सुधार करना ही पड़ेगा इसके अलावा सवर्णो में जो लोग अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर शास्त्रों की प्रमाणिक व्याख्या कर सकें उन्हें शास्त्रों के यथार्थ आशय का स्पष्टीकरण करना चाहिए ! डॉ अम्बेडकर के दोषारोपण से जो प्रश्न उठते हैं बे ये हैं १---- शास्त्र क्या है ? २----- आज जोकुछ शास्त्रों में छपा हुआ मिलता है वह क्या सभी शास्त्रों का अभिन्न भाग है ? या बे झूठ मुठ से हिन्दू धर्म को बदनाम करने के लिए लिख दिए गए हैं > ३----- इस तरह शास्त्रों का सही अर्थ प्रकाशन कर लोगों के सामने यह तथ्य लाएं कि हिन्दू धर्मशास्त्रों का अश्पृश्यता ,जाति प्रथा ,समानता सहभोज या अंतरजातीय विवाहों के सम्बन्ध में क्या कथन है ? इन सब प्रश्नों की डॉ अम्बेडकर ने अपने लेख में योगयता पूर्वक छान बीन की है !
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