सपा विधायक ने जड़ा लखनऊ विकास प्राधिकरण के सचिव को थप्पड़ ------- लोकतंत्र में आत्मसंयम ,मनोनिग्रह और इंद्रिय संयम की महत्त्व पूर्ण भूमिका होती है !लोकतंत्र एक ऐसी शाशन व्यबस्था है जो आत्मसंयम से संचालित होती है !राजव्यबस्था का सञ्चालन कठोर दण्ड के भय से होता है !इसिलए दण्ड के भय से अपराध लोकतंत्र की अपेक्छा काफी कम होते हैं !राज्य व्यबस्था बंश परंपरा से संचालित होती थी !किन्तु लोक्तान्तरिक व्यबस्था का संचालन आम जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रितिनिधियों द्वारा होता है !यही जनप्रितिनिधि गाओं सभा से लेकर संसद तक शाशन व्यबस्था के लिए विधान का निर्माण करते हैं !और विधान का पालन कार्यपालिका और न्यायपालिका द्वारा किया जाता है ! लोकतंत्र में मानव अधिकारों की रक्छा सुरक्छा पर विशेष ध्यान दिया जाता है !समाज के बंचित ,पीड़ित ,दलित ,पिछड़े अल्पसंख्यक ,निर्बल ,अपंग और महिलाओं आदि के विकास के लिए अनेक कानूनों का निर्माण होता है !रजयकर्मचार्यों ,अधिकारियों ,व्योपरिओं और अनेक अनगिनित समाजिक स्वेक्छिक संगठन अदि भी लोकतंत्र के कुशल संचालन के लिए निर्मित हो जाते हैं !इन सब संगठनो का ध्येय कागजों और भसणो में सामाजिक न्याय दिलाने का होता है! !ग्रामसभा से लेकर संसद तक का संवैधानिक दायित्तव निष्पक्छ रूप से समाज के पास सभी संसाधनों को न्याय पूर्वक पहुँचाने का होता है !किन्तु यह सब जभी सफल हो पाता है ! जब सभी संस्थाएं अपने कर्तव्यों का पालन करती है !और कर्त्तव्य पालन के लिए क़ानून से अधिक आत्मसंयम की आवश्यकता होती है !आत्मसंयम के अभाव में लोकतंत्र बेअसर और नुमायशी बन जाता है !और प्रितिनिधयों के रूपमे अत्यन्त निकृष्ट स्वार्थ पोषक लोग प्रवेश कर जाते हैं !यहाँ प्रश्न किसी राजनैतिक दल के विधयक का नहीं है ?प्रश्न विधायक और अधिकारी के आचरण का है ?!और बे जिस पिछड़े और दलित समुदाय से आते हैं ! उसके विकास और पिछड़ेपन को दूर करने का है ?! विधायक पिछड़ी जाति के हैं ! जिनके अवैध निर्माण को तोड़ने का कार्य दलित अधिकारी के द्वारा किया जा रहा है !एपिछ्डे विधायक अब इस लोकतांत्रिक व्यबस्था में इतने मजबूत हो गए हैं कि इनके पास विलास और बैभव के और शक्ति सामर्थ्य के वैधानिक और अवैधानिक इतने साधन है !kee जनप्रीतिनिधि के रूप में एक अधिकारी को थप्पड़ भी मार सकते हैं !और अपने इस अवैधानिक और आपराधिक कृत्य की रक्छा के लिए अवैध शस्त्रों से पुलिस से मुकाबला भी कर सकते हैं !दूसरी और दलित अधिकारी हैं जो थप्पड़ खाकर भी इतने भयग्रस्त है कि घटना की सही जानकारी भी नहीं दे पा रहे हैं ! दोनों में आत्मसंयम का अभाव है !यह अभाव लोकतंत्र के लिए गम्भीर खतरे के रूप में व्याप्त है !न्याय की दृष्टि का लोप हो गाय है !जो विकसित हो गया है !उसने विकास की गंगा के प्रवाह को स्वार्थ के बाँध से अवरुद्ध कर दिया है !अभी भी पिछड़े और दलित विकसित नहीं हो पाये हैं !किन्तु जो विकसित हो गए हैं !उन्होंने भोग और विलास के लिए अकूतधन संपत्ति का संचय कर लिया है !और जिन्हे सवर्ण जाति कहा जाता है !उनके पीछे ये विकसित और दलित नेता डंडा लेकर पड़े रहते हैं !और ये ज्ञानशून्य निम्न स्वार्थ निष्ठ ,वैदिक संस्कृति के आचरण ,संस्कृति ,और इतिहास से अनभिज्ञ दलित ,पिछड़े नेता ब्राह्मणो पर दलितों के उत्पीड़न का अनर्गल आरोप लगाते हैं !जबकि ब्राह्मणों ने कभी भी किसी का उत्पीड़न नहीं किया ! आज आर्थिक दृष्टि से ब्राह्मण इतना कमजोर है कि उसकी गढ़ना भी आर्थिक स्थिति के आधार पर दलितों और अति पिछड़ों में की जानी चाहिए !कुछ समृद्ध ब्राह्मणो के आधार पर ब्राह्माणों को समृद्ध मानने की गलती नहीं करनी चाहिए ! ,
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