महभारत में पाप निवारण और शुभ कर्म करने के अनेक उपाय और विधियां बतायी
गयीहै ! करत पापों का निवारण पाप कर्मों को स्पष्ट रूप से स्वीकार करने से
शुभ कर्म करने से ,पछताने से ,दान करने से ,और तपस्या से भी नष्ट होते हैं
१किन्तु पाप कर्मो की पुनरा वृत्ति नहीं करना चाहिए !त्याग करने से ,तीर्थ
यात्रा करने से ,तथा गीता आदि का नियमित स्वाध्याय कर जीवन को उपदेश के
अनुसार ढालने से भी पाप दूर होता है !धन की श्रष्टि परोपकार के ही लिए
विधाता ने की है !इसीलिए धन का उपयोग परोपकार के लिए ही करना
चाहिए भोग के लिए धन का उपयोग न तो हितकर है और न श्रेष्ठ है !मनुष्य में
अहंकार तीन रूपों में दिखाई देता है !में कुलीन हूँ .सिद्ध हूँ ,और कोई
साधारण मनुष्य नहीं हूँ !मनुष्यों को बार बार मानशिक दुखों की प्राप्ति दो
ही कारणों से होती है !चित्त का भ्रम और अनिष्ट की प्राप्ति !बुढ़ापा और
मृत्यु ये दोनों भेड़ियों के समान हैं जो बलवान दुर्बल छोटे और बड़े सभी
प्राणियों को खा जाते हैं !कोई भी मनुष्य कभी बृद्धावस्था और मृत्यु को
लाँघ नहीं सकता !भले ही वह सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय पाले !प्राणियों के
निकट जो सुख या दुःख उपस्थित होता है वह सब उन्हें विवश होकर सहना ही पड़ता
है !क्योँकि उसके टालने का कोई उपाय नहीं है !पूर्वा वष्था मध्यावश्था अथवा
उत्तरावश्था में कभी न कभी क्लेश अनिवार्य रूप से प्राप्त होते ही हैं
!मनुष्य सुखों और दुखों को प्रारवध के अनुसार पाते रहते हैं !बृद्धावस्था
और मृत्यु के वश में पड़े हुए मनुष्य को औषधि मन्त्र होम और जप भी नहीं बचा
पाते हैं
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