काल और परिस्थिति के अनुसार स्त्री पुरुषो राजाओं राज्य अधिकारीयों और
धर्माधिकारियों आदि के लिए जिस आचरण पद्धति का निर्माण होता है! उसे
शास्त्र कहते है !इसलिए शास्त्र का उल्लंघन न करने की मनाही शास्त्र
ग्रंथोँ में की गयी है !भगवान श्री कृष्णा ने गीता में कहा है कि जो मनुष्य
शाश्त्र विधि को त्याग कर वासनाओं की तृप्ति के लिए मन माना आचरण करता है!
उसको ना अन्तः करण की शुद्धि प्राप्त होती है और ना ही उसे सुख ,शांति और
परम गति की प्राप्ति होती है ! इसलिए सभी को कर्तव्य अकर्तव्य की जानकारी
के लिए शाश्त्र ही प्रमाण है इसलिए सभी को शाश्त्र विधि जान कर ही अपने
नियत कर्तव्य कर्म को करना चाहिए ! १६(२३,२४) !किन्तु वर्तमान समय भी सभी
को शाश्त्र या शस्त्र विधि की जानकारी नहीं होती है !इसलिए भगवान ने फिर
कहा कि मनुष्य को यदि शाश्त्र का ज्ञान नहीं है! तो उसको अपनी श्रद्धा के
अनुसार आचरण करना चाहिए !यहाँ स्त्रियोँ के लिए शाश्त्र आज्ञा के अनुसार जो
कर्म वर्जित किये गए है !बे गृहस्थ धर्म के परिपालन के लिए बहुत उत्तम है
!किन्तु काल, परिस्थति, देश, समाज और समय के अनुसार इनमे शंशोधन परिवर्धन
और परिवर्तन भी किया जा सकता है!
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