यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ४(७)--जब जब धर्म का पतन होता है -- धर्म से अधर्म और अध्यात्म की दो धारायें निकलती हैं !जो आचार व्योहार धर्म को दूषित प्रदूषित और बिक्रत करता है ! उसको अधर्म कहते हैं ! धर्म का नाम धर्म इसीलिए पड़ा है ! क्योंकि धर्म प्राणिमात्र को धारण करता है ! धर्म केसिद्धान्तो को आचरण में उतारने से व्यक्ति समाज देश और विश्व की भौतिक उन्नत्ति और आत्मशांति की प्राप्ति होती है ! धर्म मानव स्वभाव से पशुता निकृष्ट स्वार्थ निष्ठां आदि को निकालकर मनुष्यों में सत्य अहिंसा अस्तेय ब्रह्मचर्य असंग्रह शरीर श्रम सर्वत्र भयबर्जन अस्वाद सर्वधर्मसमानत्वव स्वदेशी स्पर्शभावना को अहंकार रहित होका नम्रता से पालन करने का शिक्छण प्रस्क्छण देता है !और धर्म का यह मूल स्वरुप सभी धर्मों के धर्मग्रंथों में दिखाई देता है !किन्तु इन सिद्धांतों का पालन करने और कराने की जिम्मेदारी जिन धर्माचार्यों की होती है !जब ये धर्माचार्य इन मूल सिधान्तो का पालन नहीं करते हैं ! तब धर्म अधर्म में परिणित होने लगता है !वैदिक धर्म में इन धर्माचार्यों को साधु संत सन्यासी कथाबचक प्रवचन कर्ता आदि कहा जाता है !इन धर्माचार्यों के वेश और शव्द तो धार्मिक होते हैं ! किन्तु आचरण में धर्म नहीं होता है !व्यासदेव ने महाभारत में कहा है धर्म की आड़ में कितने ही अधर्म चल रहे हैं ! धर्मात्मा के वेश में रहने वाले इन अधार्मिक मनुष्यों के सिर्फ शव्दों में ही इन्द्रिय संयम, पवित्रता और धर्म सम्बन्धी चर्चा आदि सभी गुण तो होते हैं किन्तु इनके आचरणों में धार्मिक पुरुषों का आचार व्योहार प्रायः अधिकाँश धर्म चर्चा करने वालों में नहीं पाया जाता है !जैन धर्म में धर्म को उत्कृष्ट मंगल कहा गया है ! इस धर्म के सत्य अहिंसा संयम लक्छण है ! जिसका मन इस धर्म पालन में लगा रहता है वही सच्चा जैन है !किन्तु धर्म के यह लक्छण जैन मुनियों में तो दिखाई देते हैं ! किन्तु श्रावकों में इनका दर्शन अधिकाँश जैनो में नहीं होता है !बौद्धधर्म में बुद्ध धर्म के मूल्य तत्त्वों की स्थापना करने वाले भिक्छु आदि होते हैं ! धम्म पद में कहा है कि जिसके हाथ पैर और वाणी में संयम है ! जिसके उठने बैठने में बोलने में और सभी क्रिया कलापों में में संयम है ! उसी को भिक्छु कहते हैं ! किन्तु जिसमे ये लक्छण नहीं है और जिसकी आकांछायें समाप्त नहीं हुई हैं ! उस मनुष्य की शुद्धि ना उसके दिगंबर रहने से, ना जटाधारण से, ना शरीर में कीचड लपेटने से, ना अनशन से, ना पृथ्वी पर सोने से, ना धूल स्नान , से और ना ही उकड़ू बैठने से हो सकती है ! ईशा मसीह ने भी कहा है कि यह संभव है की सुई के छेद से हाथी निकल जाय किन्तु धनबान का स्वर्ग में प्रवेश असंभव है ! इस्लाम का अलफातिहा इस्लाम की सार्वभौम प्रार्थना है ! प्रारम्भ करता हूँ अल्लाह के नाम से जो परम कृपालु अतीव करुणाबान है ! हे अल्लाह तू मुझे सीधी राह दिखा !इस तरह इन धर्मों के प्राणी मात्र को धारण करने के जो सार्वभौम नियम है ! उनका अभाव इन धर्मप्रचारकों में से अधिकांश में दिखाई देता है !इसिलए धर्म छल कपट पाखंड और क्रूर हिंसा का माध्यम और साधन बन गया है !और बहुत से लोग धर्म को आतंक और क्रूर हत्या आदि केरूप में प्रस्तुत कर रहे हैं !यह धर्म की एक धारा है जो अधर्म के रूप में प्रबाहित हो रही है ! यह धर्म का पतन है इसको धर्म की दूसरी धारा अध्यात्म से समाप्त किया जा सकता है !धर्म का कोई विकल्प नहीं है !इसलिए संसार को धर्मविहीन नहीं किया जा सकता है !क्योंकि मनुष्य को पशुता और निम्न स्वभाव से मुक्त कराने की शक्ति धर्म में ही है !और इस श्रेष्ठ जीवन की उपलब्धि धर्म की दूसरी धारा अध्यात्म से होती है !
No comments:
Post a Comment