देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा है स्वार्थ बुद्धि!आजकल इसका विशेष प्रभाव राजनीति में और धर्म में विशेष रूप में दिखाई दे रहा है !राजनीति की तरह धर्म भी स्वार्थों की निकृष्ट पूर्ति का अखाड़ा बन गया है !धर्म मनुष्य की बुद्धि को शुद्ध करने के बजाय अशुद्ध कर रहा है !धर्म की परिपक्वता अध्यात्म में होती है !किन्तु देश में धर्म सिर्फ बाह्य कर्मकांडों प्रवचनों और प्रत्येक धर्म अपनी श्रेष्ठता दूसरे धर्मों से श्रेष्ठ बताने में लगा हुआ है !इसिलए धर्म का मूल अध्यात्म निष्ठ स्वरुप स्वार्थ के घने अन्धकार में लुप्त हो गया है !आचार्य विनोबा ने धर्म को अध्यात्म निष्ठ बनाने के लिए आध्यात्मिक पंच निष्ठा प्रस्तुत की है ! (!)निरपेक्छ नैतििक मूल्यों में श्रद्धा ---सम्पूर्ण जीवन के लिए शाश्वत मूल्यों को आचरण में उतारने के लिए प्रयत्न करना सत्य प्रेम करुणा आदि का तिरस्कार मानव विकास और मानव धर्म की पाप्ति में सबसे बड़ी बाधा है ! इसिलए मानव धर्म मानव विकास और स्वार्थ बुद्धि के विनाश के लिए इन नैतिक मूल्यों पर आधारित जीवन जीने की आवश्यकता है !(२}प्राणिमात्र की एकता और पवित्रता ---जीवन के लिए जंतुओं पशुओं आदि का संघार किया जाता है ! प्रत्यक्छ आचरण में उंच नीच श्रेष्ठ कनिष्ठ धनबान गरीब का भेद होता है इसीलिए हमारे जीवन में इसके स्थान पर आचरण में यह आना चाहिए की प्राणी मात्र एक है और पवित्र है ! लोगों को यह समझना चाहिए कि हमारे शरीर भिन्न भिन्न है किन्तु सभी शरीरों में आत्मा एक ही है !हम सभी परमात्मा के अंश है ! इसीलिए कर्त्तव्य छेत्र में भले ही कार्य व्योहार के कारण प्राणिमात्र में एकता का दर्शन ना हो किन्तु मूल रूप में तो हमारा सम्बन्ध आत्म दृष्टि से समानता का होना चाहिए (३)--- मृत्यु के बाद भी जीवन की अखंडता ----मृत्यु के बाद भी जीवन है इस से कर्म करने में पवित्रता रहेगी !सभी धर्म किसी न किसी रूप में इसको स्वीकार करते हैं !कि मृत्यु के बाद भी जीवन किसी ना किसी रूप में रहता है !(३)साक्छात अनुभव ---कुछ लोग जन्म से ही संसारिक भोगों आदि से बिरक्त जन्म लेते हैं !बुद्ध महावीर चैतन्य महाप्रभु शंकराचार्य आदि संतो और महापुरुषों के साक्छात अनुभव से यह बातसमझ में आती है कि !इन महापुरुषों के जीवन में जन्म से ही जिस त्याग वैराग्य का दर्शन हुआ हुआ है !उस से इस बात का अनुभव होता है !की मृत्यु के साथ जीवन का अंत नहीं हुआ !(४)कर्म विकापम---- कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है !(५)विश्व में व्यबस्था है ---सूर्य समय से निकलता है आदि यह संपूर्ण व्यबस्था ठीक से चल रही है इस से अनुभव आता है की कोई रचनाकार या व्यबश्थापक है जिस से श्रष्टि संचालित हो रही है !इस आध्यात्मिक पंच निष्ठा को आचरण में उतारने से स्वार्थ बुद्धि के स्थान पर आत्मनिष्ठ बुद्धि का निर्माण हो सकता है !और आम जन को धर्मांध स्वार्थ पोषक धर्म के नाम अधर्म और हिंसा का विस्तार करने वाले लोगों से मुक्ति मिल सकती है !और धर्म का लोकनिष्ठ पका हुआ अध्यात्म निष्ठ मानव धर्म प्राप्त हो सकता है
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