Monday, 29 June 2015

गीता में उत्तम मध्यम और अधम दान को सात्त्विक राजस और तामस बताया गया है !  १७(२०,२१,२२ )में इन तीनो प्रकार के दानो का विवरण सूत्र रूप में प्रस्तुत किया गया है ! दान देना कर्त्तव्य है --ऐसे आतंरिक भाव से जो दान देश काल और दान के लिए योग्य व्यक्ति के प्राप्त होने पर निष्काम भाव से दिया जाता है वह दान सात्त्विक दान होता है ! यह उस प्रकार का दान नहीं है ! जिसमे कहा जाता है की एक गुना दान शहस्त्र गुना पुण्य लाभ ! गीता का यह दान त्याग की महिमा को मंडित करनेबाला है ! गीता के अनुसार दूसरों के हित केलिए कर्म करना यज्ञ है ! सदा प्रसन्न रहना तप है  !और उसी की वस्तु उसी की मानकर उसी को दे देना दान है ! स्वार्थ बुद्धि पूर्वक अपने लाभ के लिए यज्ञ तप दान करना आसुरी अथवा राक्छ्सी स्वभाव है ! जो दान क्लेश पूर्वक और बदले में लाभ यश कीर्ति पुण्य प्राप्ति के लिए दिया जाता है ! वह राजस दान कहलाता है  ! जो दान बिना आदर सत्कार के तथा दानलेने वाले का सम्मान ना कर अपमान पूर्वक और बिना देश काल का विचार किये कुपात्र को दिया जाता है ! वह तामस दान कहलाता है !  शास्त्रों में कहा गया है की कलयुग में दान देना ही श्रेष्ठ धर्म है ! अतः जिस किसी प्रकार से भी दान दिया जाय वह कल्याण ही करता है ! प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान ! जेन केन विधि दीन्हे दान करे कल्याण ! इसका तात्पर्य है कि कलयुग में यज्ञ तप दान ब्रत आदि शुभकर्म विधिपूर्वक करना कठिन है  !अतः किसी तरह देने की त्याग करने की आदत पड़ जाय  ! गीता का सात्विक दान वास्तव में त्याग है ! गीता में जहाँ कहीं सात्त्विक राजसिक और तामस भेद किये गए हैं ! वहां जो सात्त्विक बिभाग है ! वह ग्रहण करने के लिए है ! क्योँकि वह  आनंद और मुक्ति प्रदान करने वाला है ! और जो राजस तामस बिभाग है बे दुःख शोक और बंधन प्रदान करने वाले हैं !

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