Monday, 29 June 2015

 आत्माओं के ह्रदयों पर आक्रमण करने लगतातदात्मानं सृज्यामहम्------जब एक प्रकार का सर्वब्यापी  भौतिकबाद मानवीय है तब श्रष्टि में संतुलन कायम करने के लिए परमसत्ता मनुष्य के रूप में प्रगट होती है ! परमात्मा यद्द्पि अजर अमर है और उसका ना जन्म होता है और ना मरण होता है ! फिर भी वह दुष्ट शक्तियों को परास्त करने के लिए प्रगट होता है ! परमात्मा इस विश्व का आधार है ! शाश्वत धर्म का रक्षक भी है ! और सनातन पुरुष भी है ! अच्छाई और बुराई से पर ऐसा परमात्मा नहीं है ! जो बहुत दूर से संसार को देखता रहे ! और अधर्म के साथ चल रहे मनुष्यों के संघर्ष की परवाह ना करे ! अगर कुछ व्यक्ति अधार्मिक हो जाएँ तो उनको सुधारा जा सकता है  !परन्तु जब पूरा का पूरा समाज बिगड़ता है और निम्नस्तरीय स्वार्थनिष्ठ जीवन पद्धति को अपना लेता है ! तथा समाज को दिशा देने वाले ऐसा नेतृत्त्व प्रदान करने लगते हैं की सज्जन और साधु पुरुषों का जीवन कष्टमय हो जाता है ! और उनके असित्तत्व पर खतरा उत्पन्न हो जाता है ! तब परमसत्ता स्वयं प्रगट होकर धर्म की स्थापना के लिए कार्य करती है और अधर्म में प्रवृत्त दुष्ट व्यक्तियों का विनाश करती है !अभी अधर्म का और दुष्ट पुरुषों का इतना विस्तार नहीं हुआ है की सज्जन और साधु पुरुषों के असित्तत्व पर ही  खतरा  उत्पन्न हो जाय !धीरे धीरे समाज अधर्म की और गति कर रहा है !चरित्र निर्माण के केंद्र शिक्छा और धर्म इन दोनों पर ही स्वार्थनिष्ठ लोगों का प्रभुत्त्व स्थापित हो रहा दिखाई देता है !फिर भी कुछ शिक्छण संस्थान और आध्यात्मिक पुरुष अपने जीवन सेचरित्र शुद्धि का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं !जहाँ धर्म आश्रमों में कैद हो गया है वहां जरूर धर्म स्वार्थों का पोषक हो गया है ! किन्तु जहाँ धर्म आश्रमों से मुक्त होकर आध्यात्मिक पुरुषों द्वारा सेवित है वहां धर्म के आध्यात्मिक स्वरुप का दर्शन अभी भी होता है !इसी प्रकार कुछ शिक्छण संस्थान पैसे के प्रभाव से मुक्त होकर अपने निजी सदाचरण से उत्तम चरित्र का आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं !व्यबस्था अभी भी पूरी तरह से बिगड़ी नहीं है !व्यबस्था में अच्छी बुरे का सम्मिश्रण है !देश में लोकतांत्रिक शासन  व्यबस्था है !किन्तु लोकतंत्र के बुनियादी स्वरुप की स्थापना अभी तक नहीं हो पायी है ! !सिर्फ लोकतंत्र में  मतदान के द्ववारा राज सत्ता प्रदान करने की स्थूल प्रक्रिया का ही टूटे फूटे तरीके से ही पालन होता देखा जाता है ! भारत की आतंरिक और बाह्य समस्याओं के समाधान के लिए चरित्रवान निष्पक्छ राजनैतिक  नेतृत्त्व का निर्माण  अभी नहीं हो पाया है !चारों और ग्रामसभा से लेकर संसद तक और सभी सामाजिक धार्मिक, व्योपारिक, शैक्छणिक,  कर्मचारियों, अधिकारियों, जातीय संगठनो, और समाज सुधार तथा गैरसरकारी संगठनो आदि में भी स्वार्थनिष्ठा ही प्रभावी दिखाई देती है ! फिर भी ऐसा नहीं कहा जा सकता है की ये सभी संगठन कोई समाज हित का काम नहीं करते हैं !इन संगठनो  की समाजनिष्ठा और सेवा भाव सिमट कर इनके संचालकों के स्वार्थ पोषण में  केंद्रित हो गयी है ! जिसके कारण संस्थाओ  के लोककल्याण के मूल उद्देश्य लुप्त हो गए हैं ! लोकतंत्र का मूल आधार ही संस्थाओं का न्यायुक्त ,निष्पक्छ, निष्काम  संचालन से होता है !संस्थाओं का निर्माण तो होगया है ! अब निष्पक्छता और न्याय निष्ठा तथा निष्कामता  का निर्माण होना बाकी है !जिस तरह देश को आजाद कराने के लिए अनेक महापुरुष देश में पैदा हो गए थे 1 उसी प्रकार से लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए भी निष्पक्छ निश्वार्थ लोकसेवकों का जन्म भी देश में हो जाएगा ! और फिर संसद से लेकर ग्रामसभा तक तथा सभी शिक्छणिक धार्मिक आदि संस्थाएं लोकहित में काम करेंगी यही परमशक्ति का अवतरण होगा जो समाज व्यबस्था को स्वार्थनिष्ठ लोगों से मुक्त करेगा !

No comments:

Post a Comment