Monday, 22 June 2015

सभी मनुष्यों के कर्मो का निश्चय  बुद्धि करती है !इसिलए बुद्धि ठीक रहे ! इसकेलिए कछ नियमों का निर्माण हुआ ! जिनमे कुछ नियम कानून कहलाये जिनके पालन  करवाने के लिए राज्य व्यबस्था का जन्म हुआ! और कुछ नियमो का पालन स्वेक्छिक था उनको पालन कराने के लिए जिस व्यबस्था का जन्म हुआ उसको धर्म नाम दे दिया गया ! उन्ही नियमों को धर्म नाम दे दिया  इन्ही दो व्यबस्थाओं के द्वारा प्राणिमात्र की व्यबस्था आज भी हो रही है ! !सभी मनुष्यों की कर्म करने की रूचि और प्रवृत्ति समान नहीं होती है !किन्तु कर्म करने के साधन हाथ पैर दिल दिमाग और कार्य करने की सामग्री समान होती है ! उस सामग्री का कुछ लोग उतना ही संग्रह और उपयोग करते है जितनी आवश्यकता होती है !और  उस पर भी बे अपना  अधिकार नहीं मानते है !!जो प्राणिमात्र के  जीवन धारण करने के नैसर्गिक संसाधन जल जमीन और जंगल आदि है !उनपर बे प्राणिमात्र का अधिकार मानते हैं !!इन सबको बे सब के लिए और सबकी मानते हैं !प्राणियों के उपभोग और उपयोग आने वाले इन पदार्थों का जन्मदाता कुछ लोग ईश्वर को कुछ लोग प्रकृति को और कुछ लोग इसे अपने आप उत्पन्न होने वाली मानते हैं !जब तक इन पदार्थों को सिर्फ उपयोग और उपभोग बस्तु के रूप में ग्रहण करने की ही बृत्ति रहती है !तब तक इनके उपयोग के लिए किसी भी प्रकार की व्यबस्था के निर्माण का आवश्यकता नहीं होती है ! किन्तु जब कुछ लोगों के दिल दिमाग में इन पदार्थों पर कब्ज़ा करने की नियत  पैदा होती है !तब उसको नियंत्रित करने के लिए उनका दिलदिमाग शुद्ध रहे इसको समझाने के लिए ऐसी विधियां नियम बनाये जाते हैं जिन को समझ कर धारण कर बे प्राणिमात्र के उपयोग में आने वाले इन नैसर्गिक संसाधनो को सबके उपयोग में आने वाला मान कर  पर सिर्फ अपने ही उपभोग के लिए ही  इनका इस्तेमाल न करें !लोगो की बुद्धि में निकृष्ट स्वार्थ के स्थान पर शुद्ध सभी प्राणियों के शरीर भिन्न भिन्न है और आत्मा एक ही है इसका संचरण हो इसके लिए गांधीजी ने गीता और उपनिषदों के ज्ञान को माध्यम में बनाया और स्वयं भी पूर्ण निष्ठां से इसका पालन किया और प्रार्थना को ही अपनी आत्मशुद्धि और आत्मिक शक्ति का साधन माना और मृत्यु पर्यन्त कभी इस नियम का उल्लंघन नहीं किया !बे राम नाम को सभी आधियों व्याधियों के निवारण की अचूक औषधि   मानते रहे  !उन्होंने गीता के स्थितप्रज्ञ दर्शन के १८ श्लोकों को दैनिक प्रार्थना में शामिल किया !विनोबाजी कहते थे की अगर मेरे जीवन से ईश्वर को निकाल दो तो बाबा मिटटी का सिर्फ  लौन्दा है !उन्होंने कहा की बाबा ने जी सर्वोदय का काम हाथ में लिया है वह भी ईश्वर की प्रेरणा और आज्ञा से लिया है !और बाबा जो सर्वोदय  का कार्य कर रहा ऊह भी गीता माता की ही सेवा है !सभी लोग गांधी विनोबा की यह बात माने यह जरुरी  नहीं है !किन्तु जो अपने आप को गांधी बादी मानते है और गांधी आश्रमों में रहते हैं या सर्वोदय में हैं उनकेलिएयह बात मानना  जरुरी है !गांधी और विनोबा जिस गीता को अपनी माता कहते थे !और ईश्वर को अपना एक मात्र रक्षक मानते थे उस गीता और ईश्वर की उपेक्छा करने वाले और उसके असित्तवा पर शंका प्रकट करने वालों को ज्ञान के अनेक छेत्र खुले हुए हैं किन्तु गांधी मार्ग ऐसे सभी महान भावों के लिए उपयोगी नहीं है !

No comments:

Post a Comment