Thursday, 11 June 2015

स्वतंत्रता के बाद भारत में बहुत से लोकहितकारी कानूनो का निर्माण हुआ !उन्ही कानूनो में से एक बालश्रम निषेध कानून भी है !कानून बनने के बाद उसके सही क्रियांबन पर ही कानून की सार्थकता सिद्ध होती है !भारत में लोगों के आर्थिक स्तर में बहुत अंतर और भिन्नता है !बहुत से ऐसे स्त्री पुरुष हैं ! जो जीवन भर श्रम करते ही नहीं हैं !उनका श्रम सिर्फ खाने पीने ,सोने ,समय व्यतीत करने के लिए गप्पें लड़ाने ताशपत्ता खेलने क्लब और डॉकटरों से इलाज कराने तक ही सिमित होता है !इन परिवार के बच्चों को भी कोई श्रम नहीं करना पड़ता है ! किन्तु बड़ी संख्या में ऐसे भी लोग हैं जो स्त्री पुरुष और बच्चों के साथ निर्धारित समय से अधिक श्रम  करने के बाद भी अपनी साधारण जीबन की आवश्यकताओं की भी पूर्ति नहीं कर पाते हैं !ऐसे ही लोगों के बच्चे श्रम करते पाये जाते हैं !ये बालक भीख मांगते ,पन्नी बटोरते होटलों आदि में काम करते देखे जाते हैं !इनकी शिक्छा आदि की मुफ्त व्यबस्था के भी कानून बने हैं !किन्तु उनका क्रियांबन ठीक से नहीं होता है !जिस प्रकार अन्य विभागों का बजट भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता  है उसीप्रकार इन बालको को बाल श्रम से मुक्त करने के लिए जो पैसा आवंटित होता है उसको भी लोग खा जाते हैं !दूसरा कर्तव्य निष्ठा का आभाव भी अधिकारियों में व्याप्त है !इसीलिए बालश्रम निषेध कानूनो  की सफलता के लिए जो सुविधाएं उन्हें कानून में दी गयी हैं ! उनको  तत्परता और ईमानदारी से पालन कराया जाय ! ताकि उदर पोषण के लिए उन्हें श्रम करने की आवश्यकता ही ना पढ़े  !बालश्रम निषेध की सफलता के लिए यह प्रथम सीढ़ी है !कोई भी माता पिता अपने बालकों को शिक्छा और सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के स्थान पर काम करने के लिए भेजना नहीं चाहेंगे !किन्तु जीवन निर्वाह के लिए मजबूरी में उन्हें बालकों को काम करने के लिए भेजना पड़ता है !जो अवैधानिक है ! और अमानवीय भी है

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