Wednesday, 24 June 2015

भाई बलराम के परमधाम पधारने के पश्चात संपूर्ण गतियों के जानने वाले दिव्यदर्शी भगवान श्रीकृष्ण कुछ सोचते विचारते हुए उस सूने बन में विचरने लगे ! फिर बे श्रेष्ठ तेजबाले भगवान पृथ्वी पर बैठ गए ! सबसे पहले उन्होंने वहां उस समय  गंधारी के श्राप का स्मरण किया ! जूठी खीर को शरीर में लगाने के समय दुर्वासा ने जो बात कही थी उसका भी स्मरण उनको हो आया ! फिर उन महानुभाव श्रीकृष्ण  को अन्धक, वृष्णि, यादवों   और कुरुकुल के विनाश का भी स्मरण हुआ ! तत्पश्चात उन्होंने तीनो लोकों  के कल्याण को ध्यान में रख और दुर्बासा के बचन का पालन करने के लिए अपने परमधाम पधारने का उपयुक्त समय जानकार अपनी संपूर्ण इन्द्रियों का निरोध कर आत्मलीन हो गए ! भगवान श्रीकृष्ण संपूर्ण ज्ञानो के तत्त्वबेत्ता और अजर, अमर और अविनाशी हैं ! तो भी उन्होंने दैहिक लीला का संवरण करने के लिए किसी निमित्त को प्राप्त होने की इक्छाकी ! फिर बे मन वाणी और इन्द्रियों का निरोध करके महायोग का आश्रय ले लेट गए ! उसी समय ज़रा नाम का व्याध मृंगो को मार कर ले जाने की इक्छा से उस स्थान पर आया ! उस समय श्रीकृष्ण महायोग में स्थित थे ! उस व्याध ने श्रीकृष्ण को ही मृग समझकर उनके पैर के तलवे में में बाण मार कर घायल कर दिया ! फिर मृग को पकड़ने के लिए जब वह निकट आया तब योग में स्थित चार भुजा बाले पीताम्बर धारी भगवान श्री कृष्णा पर उसकी दृष्टि पड़ी ! व्याध अपने कोअपराधी जान कर मन ही मन बहुत भयभीत होगया ! उसने भगवान श्री कृष्णा के दोनों पैर पकड़ लिए तब भगवान श्रीकृष्ण  ने उसे आश्वासन और अभयदान देते हुए कहा की उसने कोई अपराध नहीं किया है बल्कि इस कार्य से उसे उत्तम यश कीर्ति की प्राप्ति हुई है !  फिर बे  अपनी कान्ति से पृथ्वी एवं आकाश को व्याप्त करते हुए अपने परमधाम को चले गए !भगवान श्री कृष्णा को मात्र मानव शरीर धारी मानकर उनके जन्म कर्म और मरण का आकलन नहीं करना चाहिए !भगवान ने ७(२४)कहा है बुद्धि हीन मनुष्य मेरे परम अविनाशी और सर्वश्रेष्ठ भाव को न जानते हुए मन इन्द्रियों से समझ में न आने वाले मुझ सच्चिदानंद घन परमात्मा को मनुष्य की तरह शरीर धारण करने वाला मानते हैं ! भगवान व्यक्त भी हैं , और अव्यक्त भी हैं, और अव्यक्त तथा व्यक्त दोनों से पर निर्पेक्छ प्रकाशक भी हैं ! बे अजन्मा और अविनाशी स्वरुप होते हुए भी तथा संपूर्ण प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रगट होते हैं ४(६) ! उनके जन्म और कर्म दिव्य हैं ४ (९)  !जब जब धर्म की हानि होती है ! और अधर्म की बृद्धि होती है ! तब तब बे साकार रूप में प्रगट होकर धर्म की स्थापना करते हैं सज्जन पुरुषों की रक्षा करते हैं, और यह कार्य पूर्ण होने पर देह त्याग कर निज धाम को चले जाते हैं !
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